Friday, December 17, 2010


उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में ,निश्चिंत !
क्या करूं अतिक्रमण ,ठिठक के रह जाऊं ,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,...
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं !