Monday, July 4, 2011

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों कि पौ बाराह ,
नफरत में जीना आसां है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

क्या शोर हुआ, क्या जोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

न कोई आँख सुकूं से भरी, न कोई हाथ है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

न सत्य सुना, न वाद सुना, न कल कल झरनों का नाद सुना,
चारों ओर हवाओं में यह कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की चली हवा सी थी,
अपनी बेहोशी में हमने उन फूलों को कुम्हलाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

तलवार उठा ओर बाँध कमर, अब नज़र उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !