Tuesday, January 12, 2010

Prarthna

जिस तरह से हम परमात्मा से प्रार्थना करते हैं , वह बात मौलिक रूप से ही भ्रांत है ,क्यूंकि हम प्रार्थना का वास्तविक अर्थ ही भूल चुके हैं , हमारी प्रार्थनाएं केवल हमारी वासनाओं की पूर्ति की अभिलाषा मात्र रह गयी हैं। हमारी प्रार्थनाओं के सम्बन्ध में तीन आधारभूत गलतियाँ !
प्रथम- जब भी हम परम से कोई मांग करते हैं , तो हम दरअसल क्या कह रहे हैं? कि हम परमात्मा से ज्यादा समझदार हैं ! उसे हमारी सलाह देते हैं , की चूंकि तू नहीं जानता हमारे लिए क्या हितकर है, इसलिए हम ही तुझे बता देते हैं । यह हद दर्जे की कृतघ्नता है ।

द्वितीय - क्या हम परमात्मा की चापलूसी कर रहे हैं? उसका गुणगान सुन कर वह प्रसन्न हो कर हमारी वासनाओं की पूर्ती कर देगा ? मानो परमात्मा न हुआ , कोई मिनिस्टर हो गया ! हम तो परम के स्तर तक न उठ पाए, वरन परम को ही हमने अपने स्तर तक गिरा दिया !
तृतीय - प्रार्थना एक तरह के hypnosis का भी काम करती है । चैतन्य को उर्ध्वगामी बनाना बोहोत श्रम मांगता है , तो हम एक सुगम मार्ग बना लिए हैं। आत्मानुसंधान की झंझट कौन मोल ले ! सीधे सादे शब्द दोहराए चले जाओ, काम हो गया !

ऐसी लालची , बचकानी व नपुंसक खोज से परम चैतन्य कभी नहीं मिलने वाला ! आस्तिकों की यह दुनिया इतने भयंकर कष्ट में क्यूँ पडी है? क्यूंकि हमारी मौलिक दृष्टि भ्रांत है । प्रार्थना हमारी जागतिक इच्छाओं की पूर्ती की application नहीं हो सकती। प्रार्थना तो सिर्फ एक धन्यवाद हो सकती है , उस परम के प्रति , जिसने हमारी पात्रता न होने के उपरान्त भी हमें जीवन दिया।

नयी मनुष्यता का जन्म तभी संभव है जब हम प्रार्थना को परम से भीख मांगने का उपक्रम न मान कर, केवल अनुग्रह से भर जाएँ। जितना गहरा धन्यवाद का भाव हमारे अन्दर होगा उतना ही चैतन्य हम पर बरसेगा और हमारे व्यक्तित्व का अनुपम निखार सहजता से हो जायेगा।

इसी रफ़्तार-ए-आवारा से भटकेगा यहाँ कब तक, अमीर -ए-कारवां बन जा गुबार-ए-कारवां कब तक !

Saturday, January 2, 2010

क्षण भंगुरता अस्तित्व का स्वभाव है। जीवन प्रतिक्षण नए रूप में प्रगट होता रहता है। इसी वैविध्य के कारण जीवन इतना सुन्दर भी है। तो फिर समस्या क्या है? समस्या हमारे मन में है। हमारा मन status quo चाहता है ,और यहीं हम अपनी पीड़ा का सामान तैयार कर लेते हैं। मन यथास्थिति क्यूँ बनाये रखना चाहता है? क्यूंकि हमें लगता है कि यथास्थिति में सुरक्षा है। मनुष्य जीवन कि सबसे बड़ी भ्रांतियों में से यह एक है। यथास्थिति सिर्फ एक प्रकार कि मृत्यु है। हम बार बार उन्ही विचारों से घिरे हुए एक असत्य जीवन का निर्माण कर लेते हैं जो हमें एक भंवर के समान अपने अन्दर खींच लेता है।

यह मनुष्य जीवन के सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जिस जीवन को प्रति क्षण नई सृजनात्मकता में बिताया जा सकता था, वो जीवन मात्र मृत्यु कि एक उबाऊ प्रतीक्षा बन के रह जाता है।
तो अब की बार जब मन हमें रोके तो रुकें नहीं। अज्ञात की और छलांग लें ! अस्तित्व पे भरोसा रखें ! जिसने जीवन दिया है वही सम्हालेगा भी।