Sunday, October 31, 2010

ये सारा जिस्म झुक कर. बोझ से दोहरा हुआ होगा ।

मैं सजदे में नहीं था ,आपको धोखा हुआ होगा ॥

Friday, October 29, 2010

आदि सत्य की सरल ,सशक्त अभिव्यक्ति !

Monday, October 25, 2010

मरो, हे जोगी मरो ! मरने से पहले मरो !
विरोधाभास ! किन्तु मृत्यु है इस तन की सर्वाधिक अन्तरंग घटना !
मरण इतना मीठा लगा , कि पुनः पुनः ले उसका चुम्बन ... मरने से पहले ही मैंने हज़ार बार मरने का स्वाद चखा !
"मरने से पहले मरो !" ... यूँ फरमा गए हजरत मोहम्मद भी !
भयभीत पंखों ने क्या सूरज को ललकारा है ?
वोह सब जो डराता था , जब प्रेममय हुआ , .... तभी मेरा पुनर्जन्म हुआ !
( महान सूफी संत राबिया से अनूदित )
तुझसे एक दर्द का रिश्ता भी है, बस प्यार नहीं , अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे ।
तू जहां जाती है , जा ! रोकने वाला मैं कौन , रस्ते रस्ते में ज़रा शमा जला लेने दे ॥

Sunday, October 24, 2010

बस एक गुनाह-ए-अज़ीम, शेखो पंडित ने है किया ।
मंजिल का कुछ पता ना था, राह बताये किया !

Wednesday, October 20, 2010

अल्लाह की और नज़र उठे तो प्यार से, जैसे , हम अपने पिता के पास जाते हैं , उस तरह से ... अपना दिमाग बाहर छोड़ कर ! उसने जन्म क्यूँ दिया ? वोह क्यूं मौत देता है ? पाप और पुण्य क्या हैं ? क़यामत के रोज़ जन्नत मिलेगी या जहन्नुम ? यह सब फ़िज़ूल की बातें दरवाजे पे छोड़ के जाना पड़ेगा ।
ये जगत एक विराट महाकाव्य है , जिसका ना ओर है ना कोई छोर , हमारी बचकानी बुद्धि से हम इसे समझ नहीं सकते ... हमें विराट को समझने के लिए, विराट ही ऊर्जा और दृष्टि चाहिए .... उसके लिए संकल्प और समर्पण ...दो पंख चाहियें ... फिर थोडा सत्संग हो जाये .... बस ! फिर द्वार खुल गए !
हम ही बाधा हैं , अल्लाह हमें अपने दीदार करवाने को हमसे भी ज्यादा बेताब है !
मौजों की सियासत से परेशान ना हो फानी ।
गिर्दाब की हर तह में साहिल नज़र आता है ॥

Tuesday, October 19, 2010

कोई भी नहीं जानता किस मिटटी का है वो ।

इतना मगर पता है कि अपनी भी खुशबू नहीं मिलती ॥

Monday, October 18, 2010

सिंघां देस विदेस सम , सिंघां किशा वतन्न ।

सिंह जिका वन संचरे , सो सिंघां रा बन्न ॥

एक पूरा जीवन घूमता
आँखों के समक्ष
वो जिसे कहते थे मैं

दिन प्रतिदिन
उसी के सामने बिखरते
व्यक्तित्व के भग्नावशेष

श्वास प्रश्वास से
निखरता चैतन्य
जागरण की प्रत्येक घडी
एक नयी मृत्यु !

Wednesday, October 13, 2010

आठ पहर चौबीस घडी , घुडले ऊपर वास।
सैल अणि सूं सेकतो , बाटी दुर्गादास ॥

Tuesday, October 12, 2010

सूखे दुखे समेकृत्वा, लाभालाभो जया जयो !
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापं वाप्स्यामी ॥
सुख दुःख, लाभ हानि , जय पराजय को सामान समझ कर...युद्ध के लिए तैयार हो अर्जुन ! इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा !

Friday, October 8, 2010

माई ऐड़ा पूत जन , jएडा दुर्गादास , बाँध मुंडासे राखियो, बिन थांबे आकाश !

Thursday, October 7, 2010

अजीब शहर है ये , अजब बस्ती , लोग अपना पता भी दूसरों से पूछते हैं ॥
माँ बाप अजनबी हैं , बेटे बेटी पराये, अहम् के चश्मे चढ़ा ममत्व ढूंढते हैं ॥
बेहेन भाई सशंकित, हुए रिश्ते कलंकित, दोस्ती में भी सब स्वार्थ तोलते हैं॥
ये बेदर्द हाकिम,हर चाल इनकी ज़ालिम,हम इनके सहारे सफीने खोलते हैं ?
ये अधकचरे ग्यानी, ये खोई सी वाणी, हम इनके भरोसे आत्मा छोड़ते हैं ?
भेड़ों की टोली से काट खुद को 'ओमी', सिंहों के शावक तो अकेले डोलते हैं ॥

Monday, October 4, 2010

कृष्ण जैसे व्यक्ति अपार करुणा के कारण अर्जुन के अँधेरे में भी उतरते हैं !अर्जुन का तो सामर्थ्य है नहीं कि कृष्ण की ऊंचाइयों को छू सके... कृष्ण को ही अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार ढालना पड़ता है कि अर्जुन को भगवद्गीता समझ में आ सके !

Saturday, October 2, 2010

सर पर ढेरों धूल जमी है .भागो ! टखने टखने आग बिछी है , भागो !


बंद है कारोबार, दुकानें खाली ! और सड़कों पर भीड़ लगी है , भागो !


मंजिल है दो चार कदम की दूरी पर ! और आगे दीवाल खड़ी है ,भागो !


धरती का दिल काँप रहा है शायद, घर घर हाहाकार मची है ,भागो !