अल्लाह की और नज़र उठे तो प्यार से, जैसे , हम अपने पिता के पास जाते हैं , उस तरह से ... अपना दिमाग बाहर छोड़ कर ! उसने जन्म क्यूँ दिया ? वोह क्यूं मौत देता है ? पाप और पुण्य क्या हैं ? क़यामत के रोज़ जन्नत मिलेगी या जहन्नुम ? यह सब फ़िज़ूल की बातें दरवाजे पे छोड़ के जाना पड़ेगा ।
ये जगत एक विराट महाकाव्य है , जिसका ना ओर है ना कोई छोर , हमारी बचकानी बुद्धि से हम इसे समझ नहीं सकते ... हमें विराट को समझने के लिए, विराट ही ऊर्जा और दृष्टि चाहिए .... उसके लिए संकल्प और समर्पण ...दो पंख चाहियें ... फिर थोडा सत्संग हो जाये .... बस ! फिर द्वार खुल गए !
हम ही बाधा हैं , अल्लाह हमें अपने दीदार करवाने को हमसे भी ज्यादा बेताब है !
Wednesday, October 20, 2010
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