Wednesday, March 31, 2010

जल जल के भी अंधे पतंगों को ना अक्ल आई ,
आज भी शम्मा वही है, गर्मी-ए-बाज़ार वही ।

Monday, March 29, 2010

अगर उपनिषदों का ये एक मंत्र हमारी समझ में समा जाये, तो इसके आगे सारे शास्त्र, सारे पंथ, फीके हैं। यदि ये दीख जाये कि भोग और योग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तो आमूल क्रान्ति घट सकती है। फिर किसी गुरु, किसी मंदिर, किसी भगवान् कि कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।

Tuesday, March 23, 2010

आचार्यो मृत्युह !
सच्चा सदगुरु हमारी मृत्यु बन कर आएगा !

Saturday, March 20, 2010

ये है मैकदा, यहाँ रिंद हैं , यहाँ सब का साकी इमाम है,

ये हरम नहीं अरे शेख जी,यहाँ पारसाई (restraint) हराम है ,

जो ज़रा सी पी के बहक गया, उसे मैकदे से निकाल दो,

यहाँ कमनज़र का गुज़र नहीं, यहाँ अहले ज़र्फ़ का काम है,

ये जनाब-ए-शेख का फलसफा भी अजब है सारे जहां में,

जो यहाँ पिए तो हराम है, जो वहाँ पिए तो हलाल है,

इसी कायनात से ए जिगर, कोई इंक़लाब उठेगा फिर,

के बुलंद हो के भी आदमी, यहाँ ख्वाहिशों का गुलाम है।

Monday, March 15, 2010

उठाओ हाथ, जश्न मनाने का मौसम आया,

हंसो गाओ, खुद को भुलाने का मौसम आया,

चढ़ी खुमारी,जाम टकराने का मौसम आया,

मिटी हदें,मैकश-ओ-साकी बनने का मौसम आया

Sunday, March 14, 2010

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बाराह,
नफरत में जीना आसां है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्जी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

Saturday, March 13, 2010

खुरो खस्तो रुके, रास्ता तो चले,

मैं अगर थक गया, काफिला तो चले,

चाँद सूरज बुजुर्गों के नक्श-ए-कदम, खैर जाने दो इन्हें, हवा तो चले,

हाकिम-ए-शहर यह भी कोई शहर है,मस्जिदें बंद हैं, मैकदा तो चले,

बेलचे लाओ, खोदो ज़मीन की तहें , मैं कहाँ दफ़न हूँ, कुछ पता तो चले।

.... कृष्णम शरणम गच्छामि !
ज़िन्दगी अपने दम पे जी जाती है,
औरों के दम पे तो सिर्फ जनाज़े उठा करते हैं। -भगत सिंह

Thursday, March 11, 2010

ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ है असीम विस्तार। समस्या ये है कि हमारी सीमित बुद्धि से हम असीम को समझेंगे कैसे? इसलिए ब्रह्म को समझा नहीं जाता, उसका सिर्फ अनुभव हो सकता है। सत= being, चित=conscious, आनंद= bliss । सच्चिदानंद उस ब्रह्म का स्वभाव है। सौभाग्य से ये हमारा भी स्वभाव है। इसलिए यदि हम स्वयं के अन्दर विराजमान सच्चिदानंद को अनुभव कर लें तो हमें ब्रह्म का अनुभव हो जाता है।
जैसे हम हैं वहाँ से तो ये संभव नहीं दीखता। पंडों, राजनीतिज्ञों, ओर लाला ने हमें कीडे मकोडे होने का ठीक ठीक एहसास करा दिया है। हम अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ही चुके हैं। अभी इन चालबाजियों के चलते, हम सर के बल खड़े हैं। जब हमें कबीर समझ में आने लगें, तो सीधे होने कि यात्रा शुरू हो गयी। जिस दिन हम अपने पैरों पे खड़े हुए, हम ब्रह्म से एकरूप हो जायेंगे।

Sunday, March 7, 2010

कबीरा खड़ा बज़ार में, लिए लकुटिया हाथ, जो घर बारे आपना , चले हमारे साथ।

कबीर के रूप में भारतवर्ष में एक महान प्रतिभा ने जन्म लिया था। कई बातें कबीर को भक्ति आन्दोलन में बोहोत अनूठा व अद्वितीय स्थान देती हैं। अधिकतर अवतार , या भारतीय धर्माकाश के सबसे प्रज्ज्वलित सितारे राजपुरुष थे, राजघरानों से सम्बंधित थे, या समकालीन समाज के उच्च वर्गों से आते थे।। राम, कृष्ण, बुद्ध महावीर, नागार्जुन, शंकर, मीरा , तुलसी, रामानुज, वल्लभ, आदि सभी आभिजात्य वर्ग से आते थे।

भोग विलास की प्रचुरता में यदि जीवन से ऊब ओर बिरक्ति ना हो तो वह व्यक्ति तो कोई मूढ़ ही हो सकता है, इसलिए कृष्ण ओर बुद्ध सरीखे व्यक्तियों की आध्यात्मिक खोज मूल्यवान होकर भी क्रांतिकारी नहीं है। पर दरिद्रता में भी जिसके भीतर का कमल खिला हो तो यह घटना आमूल क्रांति की हो जाती है।

कबीर के माध्यम से ही इस संभावना के द्वार खुलते हैं, कि इहलोक में धन कि प्रचुरता या सत्ता के मद से गुज़रे बिना भी जीवन की उच्चतर संभावनाओं की ओर आँख उठ सकती है। यह एक बात कबीर के असाधारण प्रतिभा व प्रज्ञा का प्रमाण देने हेतु पर्याप्त है।

दूसरी बात जो कबीर को मूल्यवान बनाती है, वो है, निर्गुण की उपासना का समाज में व्यापक प्रसार ! मीरा , सूरदास, तुलसी इत्यादि द्वारा परमात्मा के साकार रूप की उपासना के दौर में कबीर ने परम के निर्गुण रूप का सरल भाषा में प्रतिपादन किया तथा उसको अपनी वाणियों द्वारा घर घर में गूंजा दिया। मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे, में तो तेरे पास में, ऐसी सीधी चोट कबीर के ही सामर्थ्य से उपजती है ।

स्थूल रूप में परमात्मा की धारणा सरल है। केवल उपनिषदों के ऋषियों ने ही अहम् ब्रह्मास्मि का अमर उद्घोष कर निर्गुण ब्रह्म को स्थापित किया था, पर वह चैतन्य का शिखर केवल गिने चुने ब्राह्मणवादी विचारधाराओं कि गिरफ्त में ही रहा। कबीर ने न सिर्फ उस ऊंचाई को छुआ जहां सूक्ष्म निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ, बल्कि, उस निराकार परमेश्वर को लोकवाणी में बाँध कर सर्वजन के लिए उपलब्ध करा दिया। यह कोई छोटी मोती घटना नहीं थी, एक क्रांति का सूत्रपात थी। कबीर के इस साहस के चलते ही भारतवर्ष में निर्गुण संतों कि एक लम्बी श्रंखला का निर्माण हुआ, जिस में दादू, रज्जब, धर्मी दास, सहजो बाई, नानक ,पल्टू ,चरण दास, दरिया, फरीद जैसे अनेकानेक नाम आते हैं।

कबीर की तीसरी ओर सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है आध्यात्म का गृहस्थ जीवन में सहज मिश्रण ! सदियों से धर्म के अन्वेषकों के लिए संसार को छोड़ कर हिमालय की ओर प्रस्थान करना अनिवार्य माना जाता रहा है। कबीर ने प्रामाणिक रूप से ये स्थापित किया कि आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए संसार को पीठ दिखाना आवश्यक नहीं। इस संसार में रहते हुए भी जीवन के शिखर को छुआ जा सकता है। कबीर ने स्वयं विवाह किया, तथा गृहस्थ जीवन के दायित्वों को निभाते हुए आध्यात्मिक जीवन के गूढ़ रहस्यों को भी जिया। जिस तरह से रूढ़िवादी ताक़तों ने गृहस्थ जीवन को निन्दित किया था, साधारण मुनष्य के लिए परम के द्वार सर्वथा बंद कर दिए गए थे। कंचन ओर कामिनी को नरक का द्वार बता कर दकियानूसी पंडों ने धर्म के प्रगटीकरण की सब संभावनाएं ही समाप्त कर दी थी। कबीर ने अपने जीवन से ही क्रांति का आरम्भ किया। स्वयं किसी पर बोझ न रहते हुए, वे साक्षी भाव को उपलब्ध हुए। उनके आस पास रहने वालों के लिए , यह चमत्कार से कम नहीं था। इसीलिए बे पढ़े लिखे साधारण से जुलाहे का भी हज़ारों कि संख्या में शिष्यों ने अनुकरण किया। आजीविका कमाते हुए ही ,व्यक्ति ध्यान में भी जा(work meditation ) सकता है, इस युग प्रवर्तनकारी घटना के प्रणेता कबीर ही थे।

कबीर का एक ओर योगदान जो समकालीन समाज में काम में लिया जा सकता है, वह है, रूढ़ियों पर चोट, तथा सर्वथा सम्यक धर्म निरपेक्षता। सत्य का साक्षात्कार रूढ़ियों के सर्वथा विपरीत है, यह कबीर के जीवन से ही समझ में आता है। किसी कर्मकांड कि परवाह न करके, एक साधारण से जुलाहे को चादर बुनते बुनते यदि आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, तो यह बात मूल्यवान है ।

सनातन धर्म एवं इस्लाम , दोनों धर्मों की रुढियों पर कबीर ने बेहिचक चोट की है। कबीर के जीवन कि सबसे बगावती घटना उनके देह त्याग से सम्बंधित है , जिसे यहाँ उधृत करना उचित होगा। उस समय यह प्रचलित था कि काशी में मृत्यु का अर्थ सीधा वैकुण्ठ वास होगा, और एक गाँव मगहर में मरने वाला व्यक्ति निश्चित ही नरक को प्राप्त होगा। अपने अंत समय में कबीर आग्रह पूर्वक मगहर चले गए और वहीं अपनी इहलीला समाप्त की। अपने शिष्यों और प्रेमियों द्वारा विरोध पर उन्होंने एक अत्यन्य प्यारे तर्क का प्रयोग किया " काशी में मर के यदि मुक्त हुआ तो क्या मुक्त हुआ, परमात्मा कि करुणा तो तभी मानी जायेगी जब मगहर में मरूं और मुक्त हो जाऊं।" परमात्मा पर इतनी अगाध श्रद्धा और इतने प्रेम से उसे चुनौती देना, कबीर के सामर्थ्य का एक अनुपम उदाहरण है।

जैसा कि समकालीन भारतीय समाज में प्रचलित हो गया है, हम अपनी विरासत को विस्मृत करते जा रहे हैं, और इसके दुष्परिणाम हमारे सामने आने भी लगे हैं। प्रचंड भोगवाद कि संस्कृति मनुष्यता को दुःख और नफरत कि भयंकर आग में जला रही है। अपने प्रज्ञा पुरुषों को भुला कर हम अपने ही हाथों अपनी हत्या कि तय्यारी कर रहे हैं। जीवन के जिन अद्भुत रहस्यों पर से कबीर ने पर्दा उठाया है, अस्तित्व की जिन ऊंचाइयों को कबीर की प्रतिभा हमारे लिए उघाडती है, वे हमें भारतवर्ष में जन्म लेने से अनायास ही मिल गए हैं। आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम उन्हें हमारे संतों के जीवन से अवगत कराएं। कबीर जैसे महापुरुषों कि आधारशिला पर नई नस्ल उत्तुंग शिखरों का निर्माण करें ,तभी सम्यक मानवता का विकास संभव होगा।

Thursday, March 4, 2010

संतुष्टि....नहीं , चैतन्य का निखार इतनी नपुंसक घटना नहीं हो सकती। खोज समाप्त होने का अर्थ है, एक गहरी आत्मानुभूति कि जो कुछ अस्तित्व से मिला है वह पर्याप्त है। हम पोहोंच चुके हैं ! यहाँ से आगे कहीं जाने को नहीं है ! किसी भी खोज का जारी रहना, चाहे वो खोज कितनी ही सात्विक हो, अहंकार का ही निर्माण करना है। खोज पर कौन जा रहा है? ये मैं ओर मेरे की ही यात्रा है
जिस दिन ध्यान सधा , उस दिन दिख गया कि जो कुछ भी अर्थपूर्ण है, वो मेरे प्रयास से नहीं, अस्तित्व कि करुणा ओर अनुकम्पा से मिला है। कहाँ सुनन कि है नहीं देखा देखी बात ! न संतोष, न असंतोष, अब केवल विराट के समक्ष समर्पण ! सघन आनंद !