Thursday, March 11, 2010

ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ है असीम विस्तार। समस्या ये है कि हमारी सीमित बुद्धि से हम असीम को समझेंगे कैसे? इसलिए ब्रह्म को समझा नहीं जाता, उसका सिर्फ अनुभव हो सकता है। सत= being, चित=conscious, आनंद= bliss । सच्चिदानंद उस ब्रह्म का स्वभाव है। सौभाग्य से ये हमारा भी स्वभाव है। इसलिए यदि हम स्वयं के अन्दर विराजमान सच्चिदानंद को अनुभव कर लें तो हमें ब्रह्म का अनुभव हो जाता है।
जैसे हम हैं वहाँ से तो ये संभव नहीं दीखता। पंडों, राजनीतिज्ञों, ओर लाला ने हमें कीडे मकोडे होने का ठीक ठीक एहसास करा दिया है। हम अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ही चुके हैं। अभी इन चालबाजियों के चलते, हम सर के बल खड़े हैं। जब हमें कबीर समझ में आने लगें, तो सीधे होने कि यात्रा शुरू हो गयी। जिस दिन हम अपने पैरों पे खड़े हुए, हम ब्रह्म से एकरूप हो जायेंगे।

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