Thursday, March 4, 2010

संतुष्टि....नहीं , चैतन्य का निखार इतनी नपुंसक घटना नहीं हो सकती। खोज समाप्त होने का अर्थ है, एक गहरी आत्मानुभूति कि जो कुछ अस्तित्व से मिला है वह पर्याप्त है। हम पोहोंच चुके हैं ! यहाँ से आगे कहीं जाने को नहीं है ! किसी भी खोज का जारी रहना, चाहे वो खोज कितनी ही सात्विक हो, अहंकार का ही निर्माण करना है। खोज पर कौन जा रहा है? ये मैं ओर मेरे की ही यात्रा है
जिस दिन ध्यान सधा , उस दिन दिख गया कि जो कुछ भी अर्थपूर्ण है, वो मेरे प्रयास से नहीं, अस्तित्व कि करुणा ओर अनुकम्पा से मिला है। कहाँ सुनन कि है नहीं देखा देखी बात ! न संतोष, न असंतोष, अब केवल विराट के समक्ष समर्पण ! सघन आनंद !

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