अगर उपनिषदों का ये एक मंत्र हमारी समझ में समा जाये, तो इसके आगे सारे शास्त्र, सारे पंथ, फीके हैं। यदि ये दीख जाये कि भोग और योग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तो आमूल क्रान्ति घट सकती है। फिर किसी गुरु, किसी मंदिर, किसी भगवान् कि कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।
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