Saturday, March 20, 2010

ये है मैकदा, यहाँ रिंद हैं , यहाँ सब का साकी इमाम है,

ये हरम नहीं अरे शेख जी,यहाँ पारसाई (restraint) हराम है ,

जो ज़रा सी पी के बहक गया, उसे मैकदे से निकाल दो,

यहाँ कमनज़र का गुज़र नहीं, यहाँ अहले ज़र्फ़ का काम है,

ये जनाब-ए-शेख का फलसफा भी अजब है सारे जहां में,

जो यहाँ पिए तो हराम है, जो वहाँ पिए तो हलाल है,

इसी कायनात से ए जिगर, कोई इंक़लाब उठेगा फिर,

के बुलंद हो के भी आदमी, यहाँ ख्वाहिशों का गुलाम है।

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