Monday, October 25, 2010

मरो, हे जोगी मरो ! मरने से पहले मरो !
विरोधाभास ! किन्तु मृत्यु है इस तन की सर्वाधिक अन्तरंग घटना !
मरण इतना मीठा लगा , कि पुनः पुनः ले उसका चुम्बन ... मरने से पहले ही मैंने हज़ार बार मरने का स्वाद चखा !
"मरने से पहले मरो !" ... यूँ फरमा गए हजरत मोहम्मद भी !
भयभीत पंखों ने क्या सूरज को ललकारा है ?
वोह सब जो डराता था , जब प्रेममय हुआ , .... तभी मेरा पुनर्जन्म हुआ !
( महान सूफी संत राबिया से अनूदित )

2 comments:

  1. मरो हे जोगी मरो। बहुत खूब।आनंद आ गया। बात अंदर तक चली गई। वैसे साहिर ने यह भी कहा है : जाओ रे जोगी तुम जाओ रे / ये है प्रेमियों की नगरी / यहाँ प्रेम ही है पूजा।

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  2. धन्यवाद राजेंद्र जी ! राबिया जैसी विभूतियों का अनुसरण करें तो संसार के सब दुःख कट सकतेहैं !

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