जागिये ! आप भी देवता हैं !
तत त्वम् असि श्वेतकेतु ! तू भी तत्व रूप से वोही ब्रह्म है श्वेतकेतु !
Friday, November 19, 2010
Thursday, November 18, 2010
लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आये ,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आये ...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने ,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने ,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना ,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना ,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना ,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए !
पर इस दिवाली पे आप बार बार आये ...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने ,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने ,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना ,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना ,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना ,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए !
Monday, November 15, 2010
Sunday, November 14, 2010
Saturday, November 13, 2010
Thursday, November 11, 2010
ग़लत नहीं थी ये बात, के वो है तुम्हारे पास ।
पर इन हाथों से ना पकड़ पाओगी उसके हाथ ।
कुनकुने विश्वास से बिगड़ी बात ना बनेगी ।
फूल सी यह ज़िन्दगी कुम्हलाई ही रहेगी ।
बदल अपनी आँख , स्वयं को रूपांतरित कर लो।
वो ही है सब ऑर, खाली झोलियाँ भर लो ।
हवा का झोंका भी फिर तुझे सम्हाल जायेगा ।
स्वर्ग कहीं और नहीं , धरती पे उतर आयेगा । ..शुभमस्तु !
पर इन हाथों से ना पकड़ पाओगी उसके हाथ ।
कुनकुने विश्वास से बिगड़ी बात ना बनेगी ।
फूल सी यह ज़िन्दगी कुम्हलाई ही रहेगी ।
बदल अपनी आँख , स्वयं को रूपांतरित कर लो।
वो ही है सब ऑर, खाली झोलियाँ भर लो ।
हवा का झोंका भी फिर तुझे सम्हाल जायेगा ।
स्वर्ग कहीं और नहीं , धरती पे उतर आयेगा । ..शुभमस्तु !
Wednesday, November 10, 2010
उभरते भावों को शब्दों से समझाना था , कहने सुनने से क्या बात बनती ? गाफिल ज़माना था !
उपजता कुछ, मैं कहता कुछ , वो सुनते कुछ ,समझते कुछ ! ताश के पत्तों का महल इक बनाना था !
लौट लौट पड़ती मेरी चिल्लाहट मेरे ही चैतन्य पर , तूफानों के साये में मोमबत्तियां जलाना था !
प्रेम था, अपनत्व भी , करुणा भी थी , ममत्व भी , शब्दों की फूटी नाव से मगर, पार इन्हें लगाना था !
कौन किसकी सुनता है यहाँ ओमी ? सबको इक कुंठित ह्रदय से अपना धुंआ छितराना था !
बढ़ के कोई भी किसी के पोंछता आंसूं नहीं, अपने दुखों के बोझ से क्या सबको यूँ मर जाना था ?
बैठ अपने साथ , थोडा सा स्वयं को आराम दे, शोर के उस पार की आवाज़ भी तो पाना था !
झाँक मेरी आँख में , मेरी गर्मी को महसूस कर, तुझमें मुझमें भी कोई अपना , कोई बेगाना था ?
उपजता कुछ, मैं कहता कुछ , वो सुनते कुछ ,समझते कुछ ! ताश के पत्तों का महल इक बनाना था !
लौट लौट पड़ती मेरी चिल्लाहट मेरे ही चैतन्य पर , तूफानों के साये में मोमबत्तियां जलाना था !
प्रेम था, अपनत्व भी , करुणा भी थी , ममत्व भी , शब्दों की फूटी नाव से मगर, पार इन्हें लगाना था !
कौन किसकी सुनता है यहाँ ओमी ? सबको इक कुंठित ह्रदय से अपना धुंआ छितराना था !
बढ़ के कोई भी किसी के पोंछता आंसूं नहीं, अपने दुखों के बोझ से क्या सबको यूँ मर जाना था ?
बैठ अपने साथ , थोडा सा स्वयं को आराम दे, शोर के उस पार की आवाज़ भी तो पाना था !
झाँक मेरी आँख में , मेरी गर्मी को महसूस कर, तुझमें मुझमें भी कोई अपना , कोई बेगाना था ?
Tuesday, November 9, 2010
Thursday, November 4, 2010
विशयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरानार्थिनाह ।
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधे एकाग्र्सिद्धाये ॥
विषय रुपी हाथियों से डर कर, मूढ़ पुरुष, अपनी रक्षा हेतु , चित्त की एकाग्रता व निरोधिता की सिद्धि के लिए , शीघ्रता से पहाड़ों की गुफाओं में प्रवेश कर जाते हैं ।
निर्वासनं हरिम दृष्ट्वा तूश्निम विशय्दंतिनाह ।
पलायन्ते ना शक्तास्ते ,सेवन्ते कृत चाटवः ॥
वासना रहित पुरुष रुपी सिंह को देख कर असमर्थ हुए विषय रुपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं , स्वयं में स्थित हुआ वह वासना रहित पुरुष ,इश्वर से अष्टावक्र गीता इस जगत का सेवन करता है ! ( Ashtavakra Geeta )
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधे एकाग्र्सिद्धाये ॥
विषय रुपी हाथियों से डर कर, मूढ़ पुरुष, अपनी रक्षा हेतु , चित्त की एकाग्रता व निरोधिता की सिद्धि के लिए , शीघ्रता से पहाड़ों की गुफाओं में प्रवेश कर जाते हैं ।
निर्वासनं हरिम दृष्ट्वा तूश्निम विशय्दंतिनाह ।
पलायन्ते ना शक्तास्ते ,सेवन्ते कृत चाटवः ॥
वासना रहित पुरुष रुपी सिंह को देख कर असमर्थ हुए विषय रुपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं , स्वयं में स्थित हुआ वह वासना रहित पुरुष ,इश्वर से अष्टावक्र गीता इस जगत का सेवन करता है ! ( Ashtavakra Geeta )
Wednesday, November 3, 2010
Monday, November 1, 2010
हर तरफ खुदा ही जलवानुमा है, बस देखने वाली नज़र चाहिए ॥
उसका होना होता है ज़ाहिर भी , दिल में जुनूं तो मगर चाहिए ॥
तारे हुस्न ज़िन्दगी सभी हैं, और क्या तुझे उसकी खबर चाहिए ॥
वो तुझमें भी है और मुझमें भी, तलाश में बस असर चाहिए ॥
कुलबुलाने से बात बनेगी नहीं , इंसानियत को एक ग़दर चाहिए ॥
वो बयान है तेरे होने ही में , ये सीधी बात समझे वो सर चाहिए ॥
उसका होना होता है ज़ाहिर भी , दिल में जुनूं तो मगर चाहिए ॥
तारे हुस्न ज़िन्दगी सभी हैं, और क्या तुझे उसकी खबर चाहिए ॥
वो तुझमें भी है और मुझमें भी, तलाश में बस असर चाहिए ॥
कुलबुलाने से बात बनेगी नहीं , इंसानियत को एक ग़दर चाहिए ॥
वो बयान है तेरे होने ही में , ये सीधी बात समझे वो सर चाहिए ॥
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