उभरते भावों को शब्दों से समझाना था , कहने सुनने से क्या बात बनती ? गाफिल ज़माना था !
उपजता कुछ, मैं कहता कुछ , वो सुनते कुछ ,समझते कुछ ! ताश के पत्तों का महल इक बनाना था !
लौट लौट पड़ती मेरी चिल्लाहट मेरे ही चैतन्य पर , तूफानों के साये में मोमबत्तियां जलाना था !
प्रेम था, अपनत्व भी , करुणा भी थी , ममत्व भी , शब्दों की फूटी नाव से मगर, पार इन्हें लगाना था !
कौन किसकी सुनता है यहाँ ओमी ? सबको इक कुंठित ह्रदय से अपना धुंआ छितराना था !
बढ़ के कोई भी किसी के पोंछता आंसूं नहीं, अपने दुखों के बोझ से क्या सबको यूँ मर जाना था ?
बैठ अपने साथ , थोडा सा स्वयं को आराम दे, शोर के उस पार की आवाज़ भी तो पाना था !
झाँक मेरी आँख में , मेरी गर्मी को महसूस कर, तुझमें मुझमें भी कोई अपना , कोई बेगाना था ?
Wednesday, November 10, 2010
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किसी ने यह भी कहा है : गम-ए-हस्ती के बस बेगाना होता, खुदाया काश मैं दीवाना होता।
ReplyDeleteबोहोत अस्तित्वगत उक्ति है ! धन्यवाद राजेंद्र जी !
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