विशयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरानार्थिनाह ।
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधे एकाग्र्सिद्धाये ॥
विषय रुपी हाथियों से डर कर, मूढ़ पुरुष, अपनी रक्षा हेतु , चित्त की एकाग्रता व निरोधिता की सिद्धि के लिए , शीघ्रता से पहाड़ों की गुफाओं में प्रवेश कर जाते हैं ।
निर्वासनं हरिम दृष्ट्वा तूश्निम विशय्दंतिनाह ।
पलायन्ते ना शक्तास्ते ,सेवन्ते कृत चाटवः ॥
वासना रहित पुरुष रुपी सिंह को देख कर असमर्थ हुए विषय रुपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं , स्वयं में स्थित हुआ वह वासना रहित पुरुष ,इश्वर से अष्टावक्र गीता इस जगत का सेवन करता है ! ( Ashtavakra Geeta )
Thursday, November 4, 2010
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