Friday, February 19, 2010
बाप बोहोत सी बातें नहीं भी जानता है, जो बेटा जान सकता है। रोज़ ज्ञान विकसित हो रहा है ,इसलिए बाप का ज्ञान तो पिछड़ता जाता है, out of date होता जाता है। तो बेटे के मन में स्वाभाविक हो सकता है कि बाप कुछ भी नहीं जानता । श्रद्धा कैसे पैदा हो?श्रद्धा किन्हीं तथ्यों पे आधारित नहीं हो सकती, श्रद्धा तो केवल इस बात पे आधारित हो सकती है कि पिता उद्गम है ,स्रोत है,जहां से में आया हूँ उस से पार जाने का कोई उपाय नहीं ! मैं कितना ही जान लूँ, मैं कितना ही बड़ा हो जाऊं , मेरा अहंकार कितना ही प्रतिष्ठित हो जाए, लेकिन फिर भी मूल ओर उद्गम के सामने मुझे नत होना ही है, क्यूंकि कोई भी अपने उद्गम से ऊपर नहीं जा सकता । कोई वृक्ष बीज से बड़ा नहीं होता, हो भी नहीं सकता। बीज में पूरा वृक्ष छुपा है। कितना ही विराट वृक्ष हो जाये, वो छोटे से बीज में छिपा है। उस से अन्यथा होने कि कोई नियति नहीं है। ओर अंतिम परिणाम जो वृक्ष का होगा वो यह कि वो उन्ही बीजों को पुनः पैदा कर जाएगा।
उद्गम से आप कभी बड़े नहीं हो सकते। मूल से विकास कभी बड़ा नहीं हो सकता। वृक्ष से बीज बड़ा नहीं, चाहे कितना ही बड़ा दिखाई पड़े। इस अस्तित्वगत घटना कि गहरी प्रतीति,माता पिता के प्रति गहरे आदर से भर सकती है, लेकिन आप इसे माता पिता कि तरह नहीं सुनना , बेटे व बेटियों कि तरह इसे सुनना। यह सुनकर माता पिता के प्रति आपके ह्रदय में श्रद्धा उठे ,इसलिए कह रहा हूँ । अपने घर मैं अपने बच्चों से श्रधा मत मांगने लग जाना, क्यूंकि तब आप बात चूक ही गए।
जिस समाज मैं भी, माता पिता के प्रति आदर कम हो जाएगा, उस समाज में इश्वर भाव खो जाता है, क्यूंकि इश्वर आदि उद्गम है। वो परम स्रोत है। अगर आप अपने बाप से आगे चले गए हैं, तीस साल में , अगर आप ओर आपके बाप के बीच तीस साल का फासला है तो, परम पिता परमेश्वर से तो आप बोहोत आगे चले गए होंगे। अरबों खरबों वर्षों का फासला हो गया है। अगर परमात्मा मिल जाये तो महा जड़ ,महा मूढ़ मालूम पड़ेगा , जब पिता ही मूढ़ मालूम पड़ता है। अगर परमात्मा से आपका मिलन हो तो वोह तो आपको मनुष्य भी मालूम नहीं पड़ेगा। पीछे की ओर, मूलकी ओर, उद्गम कि ओर, सम्मान का बोध अत्यंत विचार ओर विवेक कि निष्पत्ति है , वो प्रकृति से नहीं मिलती, विमर्श,चिंतन व ध्यान से उपलब्ध होती है। पर ध्यान रहे जो भी कहा जा रहा है, वोह आपसे बेटे -बेटियों की तरह कहा जा रहा है, माता ओर पिता कि तरह नहीं।
Wednesday, February 17, 2010
हर आन हंसी हर आन ख़ुशी हर आन अमीरी है बाबा , जब आशिक मस्त फकीर हुए तब क्या दिलगीरी है बाबा ,
हम चाकर जिसके हुस्न के हैं, वो दिलबर सबसे आला है, उसने ही हमको जी बक्शा उसने ही हमको पाला है।
क्या कहिये ओर नजीब आगे, अब कौन समझे वाला है, हर आन हंसी........
कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ जोर नहीं, कुछ दाद नहीं फ़रियाद नहीं, कुछ क़ैद नहीं कुछ बंद नहीं ,कुछ फ़िक्र नहीं, आज़ाद नहीं।
शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं, हैं जितनी बातें दुनिया की , सब भूल गए, कुछ याद नहीं।
हर आन हंसी......
है आशिक ओर माशूक जहां वहाँ शाह-ए-वजीरी है बाबा, न रोना है न धोना है, न दर्द असीरी है बाबा,
दिन रात बहारें चौलें हैं ओर ऐश-ए-सफीरी है बाबा, जो आशिक हुए सो जाने हैं ये भेद फकीरी है बाबा ।
Sunday, February 14, 2010
Friday, February 12, 2010
सलिल कण हूँ ,कि पारावार हूँ मैं , स्वयं छाया स्वयं आधार हूँ मैं,
बंधा हूँ स्वप्न में लघु वृत्त में हूँ मैं, यूँ तो व्योम का विस्तार हूँ मैं,
समाना चाहती जो बीन उर में , विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं,
भटकता खोजता हूँ ज्योति तम में, सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं ।
अहम् ब्रह्मास्मि ।
I am the eternal Brahm.
बंधा हूँ स्वप्न में लघु वृत्त में हूँ मैं, यूँ तो व्योम का विस्तार हूँ मैं,
समाना चाहती जो बीन उर में , विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं,
भटकता खोजता हूँ ज्योति तम में, सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं ।
अहम् ब्रह्मास्मि ।
I am the eternal Brahm.
Thursday, February 11, 2010
जीवन में प्रत्येक कड़वे मीठे अनुभव को अपने चैतन्य को निखारने हेतु प्रयोग में लिया जा सकता है। यह जगत एक विराट विश्वविद्यालय है। यदि हमारे पास दृष्टि हो तो हम सतत अपने जीवन को विकासोन्मुखी कर सकते हैं।
कष्ट जीवन का तथ्य (fact) है, दुःख हमारी व्याख्या है । बचकानी बुद्धि के कारण ही हम जीवन के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर सुख ओर दुःख बना लेते हैं। वयस्क बुद्धि जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है। बचकानी बुद्धि के कारण ही हम अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं ( blame game) , और अपने सुखों के लिए खुद की पीठ ठोकते हैं । हम ये भूल बैठे हैं कि सुख और दुःख हमारे मन के प्रक्षेपण (projections) हैं। जो आज सुख है वोह कल दुःख हो जायेगा , जो कल दुःख था वोह आज सुख है। तात्विक दृष्टि से तो सुख और दुःख केवल त्रिगुणों का बरतना है ,चेतना को तो यह गुण छूते भी नहीं हैं, परन्तु सांसारिक दृष्टि से भी यदि हम जीवन के सत्य को पहचान लें तो हमारा बोहोत सा कष्ट कम हो सकता है।
जीवन की प्रत्येक सफलता -असफलता , सम्बन्ध, प्रेम, पीड़ा , आशा और निराशा , मैत्री और शत्रुता , जैसे प्रत्येक अनुभव का प्रयोग यदि हम केवल अपने जीवन को निखारने के लिए करें तभी नए मनुष्य का विकास संभव है। लेकिन बचकानी बुद्धि से यह नहीं हो सकता , इसके लिए एक सम्यक रूप से विकसित वयस्क बुद्धि चाहिए। सतत अन्तरावलोकन (introspection) ! मैं सुख और दुःख का निर्माण कर रहा हूँ या अपनी आत्मा का विकास ! इतनी जागरूकता तो चाहिए ही ।
ठोकरें खा कर भी न सम्हले ये मुसाफिर का नसीब,
राह के पत्थर ने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया ।
कष्ट जीवन का तथ्य (fact) है, दुःख हमारी व्याख्या है । बचकानी बुद्धि के कारण ही हम जीवन के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर सुख ओर दुःख बना लेते हैं। वयस्क बुद्धि जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है। बचकानी बुद्धि के कारण ही हम अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं ( blame game) , और अपने सुखों के लिए खुद की पीठ ठोकते हैं । हम ये भूल बैठे हैं कि सुख और दुःख हमारे मन के प्रक्षेपण (projections) हैं। जो आज सुख है वोह कल दुःख हो जायेगा , जो कल दुःख था वोह आज सुख है। तात्विक दृष्टि से तो सुख और दुःख केवल त्रिगुणों का बरतना है ,चेतना को तो यह गुण छूते भी नहीं हैं, परन्तु सांसारिक दृष्टि से भी यदि हम जीवन के सत्य को पहचान लें तो हमारा बोहोत सा कष्ट कम हो सकता है।
जीवन की प्रत्येक सफलता -असफलता , सम्बन्ध, प्रेम, पीड़ा , आशा और निराशा , मैत्री और शत्रुता , जैसे प्रत्येक अनुभव का प्रयोग यदि हम केवल अपने जीवन को निखारने के लिए करें तभी नए मनुष्य का विकास संभव है। लेकिन बचकानी बुद्धि से यह नहीं हो सकता , इसके लिए एक सम्यक रूप से विकसित वयस्क बुद्धि चाहिए। सतत अन्तरावलोकन (introspection) ! मैं सुख और दुःख का निर्माण कर रहा हूँ या अपनी आत्मा का विकास ! इतनी जागरूकता तो चाहिए ही ।
ठोकरें खा कर भी न सम्हले ये मुसाफिर का नसीब,
राह के पत्थर ने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया ।
Sunday, February 7, 2010
मेरे नन्हे से रिंकू ,
यदि इस गीत के मर्म की हल्की सी झलक भी तुम्हें मिली है , तो तुम भाग्यशाली हो। याद है ना , परमात्मा सृजन में बसता है । अपने आसपास बिखरे हुए परम का आनंद लो। एक ही बात स्मरण रहे, अहंकार की यात्रा पे मत निकल जाना। तुम्हें परम का स्वाद मिल रहा है, इसका मतलब यह नहीं की किसी ओर को नहीं मिल रहा है। सब की अपनी अपनी यात्रा है। सबकी ओर समझ ओर करुणा से देखना। अन्यथा परम का यह खुला दरवाजा भी तुम्हारे लिए बंद न हो जाए ! ................आनंद !
प्रेम,
यदि इस गीत के मर्म की हल्की सी झलक भी तुम्हें मिली है , तो तुम भाग्यशाली हो। याद है ना , परमात्मा सृजन में बसता है । अपने आसपास बिखरे हुए परम का आनंद लो। एक ही बात स्मरण रहे, अहंकार की यात्रा पे मत निकल जाना। तुम्हें परम का स्वाद मिल रहा है, इसका मतलब यह नहीं की किसी ओर को नहीं मिल रहा है। सब की अपनी अपनी यात्रा है। सबकी ओर समझ ओर करुणा से देखना। अन्यथा परम का यह खुला दरवाजा भी तुम्हारे लिए बंद न हो जाए ! ................आनंद !
प्रेम,
Friday, February 5, 2010
तारों से सोना बरसा था, चश्मों से चांदी बहती थी,
फूलों पर मोती बिखरे थे , ज़र्रों की किस्मत चमकी थी,
खुशबू के खजाने लुटते थे, और दुनिया बहकी बहकी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं अब याद नहीं,
सूरज की नर्म शिराओं पर ,कलियों के रूप निखारते हों ,
सरसों के नाज़ुक शाखों पर, सोने के फूल चमकते हों,
ऐ दोस्त तुझे................
फूलों के सागर अपने थे, शबनम की सहबा अपनी थी,
ज़र्रों के हीरे अपने थे, तारों की माला अपनी थी,
दरिया की लहरें अपनी थी, लहरों का तरन्नुम अपना था,
ज़र्रों से ले केर तारों तक यह सारी दुनिया अपनी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं, अब याद नहीं।
फूलों पर मोती बिखरे थे , ज़र्रों की किस्मत चमकी थी,
खुशबू के खजाने लुटते थे, और दुनिया बहकी बहकी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं अब याद नहीं,
सूरज की नर्म शिराओं पर ,कलियों के रूप निखारते हों ,
सरसों के नाज़ुक शाखों पर, सोने के फूल चमकते हों,
ऐ दोस्त तुझे................
फूलों के सागर अपने थे, शबनम की सहबा अपनी थी,
ज़र्रों के हीरे अपने थे, तारों की माला अपनी थी,
दरिया की लहरें अपनी थी, लहरों का तरन्नुम अपना था,
ज़र्रों से ले केर तारों तक यह सारी दुनिया अपनी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं, अब याद नहीं।
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