मेरे नन्हे से रिंकू ,
यदि इस गीत के मर्म की हल्की सी झलक भी तुम्हें मिली है , तो तुम भाग्यशाली हो। याद है ना , परमात्मा सृजन में बसता है । अपने आसपास बिखरे हुए परम का आनंद लो। एक ही बात स्मरण रहे, अहंकार की यात्रा पे मत निकल जाना। तुम्हें परम का स्वाद मिल रहा है, इसका मतलब यह नहीं की किसी ओर को नहीं मिल रहा है। सब की अपनी अपनी यात्रा है। सबकी ओर समझ ओर करुणा से देखना। अन्यथा परम का यह खुला दरवाजा भी तुम्हारे लिए बंद न हो जाए ! ................आनंद !
प्रेम,
Sunday, February 7, 2010
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