Friday, February 5, 2010

तारों से सोना बरसा था, चश्मों से चांदी बहती थी,
फूलों पर मोती बिखरे थे , ज़र्रों की किस्मत चमकी थी,
खुशबू के खजाने लुटते थे, और दुनिया बहकी बहकी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं अब याद नहीं,
सूरज की नर्म शिराओं पर ,कलियों के रूप निखारते हों ,
सरसों के नाज़ुक शाखों पर, सोने के फूल चमकते हों,
ऐ दोस्त तुझे................
फूलों के सागर अपने थे, शबनम की सहबा अपनी थी,
ज़र्रों के हीरे अपने थे, तारों की माला अपनी थी,
दरिया की लहरें अपनी थी, लहरों का तरन्नुम अपना था,
ज़र्रों से ले केर तारों तक यह सारी दुनिया अपनी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं, अब याद नहीं।

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