जीवन में प्रत्येक कड़वे मीठे अनुभव को अपने चैतन्य को निखारने हेतु प्रयोग में लिया जा सकता है। यह जगत एक विराट विश्वविद्यालय है। यदि हमारे पास दृष्टि हो तो हम सतत अपने जीवन को विकासोन्मुखी कर सकते हैं।
कष्ट जीवन का तथ्य (fact) है, दुःख हमारी व्याख्या है । बचकानी बुद्धि के कारण ही हम जीवन के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर सुख ओर दुःख बना लेते हैं। वयस्क बुद्धि जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है। बचकानी बुद्धि के कारण ही हम अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं ( blame game) , और अपने सुखों के लिए खुद की पीठ ठोकते हैं । हम ये भूल बैठे हैं कि सुख और दुःख हमारे मन के प्रक्षेपण (projections) हैं। जो आज सुख है वोह कल दुःख हो जायेगा , जो कल दुःख था वोह आज सुख है। तात्विक दृष्टि से तो सुख और दुःख केवल त्रिगुणों का बरतना है ,चेतना को तो यह गुण छूते भी नहीं हैं, परन्तु सांसारिक दृष्टि से भी यदि हम जीवन के सत्य को पहचान लें तो हमारा बोहोत सा कष्ट कम हो सकता है।
जीवन की प्रत्येक सफलता -असफलता , सम्बन्ध, प्रेम, पीड़ा , आशा और निराशा , मैत्री और शत्रुता , जैसे प्रत्येक अनुभव का प्रयोग यदि हम केवल अपने जीवन को निखारने के लिए करें तभी नए मनुष्य का विकास संभव है। लेकिन बचकानी बुद्धि से यह नहीं हो सकता , इसके लिए एक सम्यक रूप से विकसित वयस्क बुद्धि चाहिए। सतत अन्तरावलोकन (introspection) ! मैं सुख और दुःख का निर्माण कर रहा हूँ या अपनी आत्मा का विकास ! इतनी जागरूकता तो चाहिए ही ।
ठोकरें खा कर भी न सम्हले ये मुसाफिर का नसीब,
राह के पत्थर ने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया ।
Thursday, February 11, 2010
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