सलिल कण हूँ ,कि पारावार हूँ मैं , स्वयं छाया स्वयं आधार हूँ मैं,
बंधा हूँ स्वप्न में लघु वृत्त में हूँ मैं, यूँ तो व्योम का विस्तार हूँ मैं,
समाना चाहती जो बीन उर में , विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं,
भटकता खोजता हूँ ज्योति तम में, सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं ।
अहम् ब्रह्मास्मि ।
I am the eternal Brahm.
Friday, February 12, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment