एक भी व्यक्ति मशाल जला रहा है तो भी काफी है। यहाँ तो हम सब हैं। अपने अपने घरों में, दोस्तों में, आसपास, बात करते रहेंगे , बस काम हो जायेगा ।
मुझे याद है, तुमने अपने लहू से माँ को अर्घ्य चढ़ाया था,
जानता हूँ मैं यह शबाब-ए-वतन तेरे जूनून से है।
भगत सिंह, राजगुरु ओर सुखदेव ,हम में जिंदा हैं ।
Friday, February 19, 2010
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