Wednesday, February 17, 2010

हर आन हंसी हर आन ख़ुशी हर आन अमीरी है बाबा , जब आशिक मस्त फकीर हुए तब क्या दिलगीरी है बाबा ,

हम चाकर जिसके हुस्न के हैं, वो दिलबर सबसे आला है, उसने ही हमको जी बक्शा उसने ही हमको पाला है।

क्या कहिये ओर नजीब आगे, अब कौन समझे वाला है, हर आन हंसी........

कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ जोर नहीं, कुछ दाद नहीं फ़रियाद नहीं, कुछ क़ैद नहीं कुछ बंद नहीं ,कुछ फ़िक्र नहीं, आज़ाद नहीं।

शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं, हैं जितनी बातें दुनिया की , सब भूल गए, कुछ याद नहीं।

हर आन हंसी......

है आशिक ओर माशूक जहां वहाँ शाह-ए-वजीरी है बाबा, न रोना है न धोना है, न दर्द असीरी है बाबा,

दिन रात बहारें चौलें हैं ओर ऐश-ए-सफीरी है बाबा, जो आशिक हुए सो जाने हैं ये भेद फकीरी है बाबा ।

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