जलाल-ए-आतिशो बरको सहाब पैदा कर, अजल भी कांप उठे वो शबाब पैदा कर।
तेरे खराम में हैं ज़लज़लों का राज़ निहां, हरेक गाम पे इक इंक़लाब पैदा कर।
बोहोत लतीफ़ हैं ऐ दोस्त तेक का बोसा,यही है जानेजां इसमें आब पैदा कर।
तेरा शबाब अमानत है सारी दुनिया की, तू खार जारे जहां में गुलाब पैदा कर।
तू इंक़लाब की आमत है इंतज़ार ना कर, जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर।
क्रान्ति आती नहीं , क्रांति में जाना पड़ता है .....
Thursday, April 29, 2010
Monday, April 26, 2010
तड़पना है ना जलना है ना जल कर ख़ाक होना है, ये क्यूँ सोई हुई है फितरत-ए-परवाना बरसों से । कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे,नहीं मालूम क्यूँ खामोश है दीवाना बरसों से।
कोई सोजे तजल्ली से उसे निस्बत ना थी गोया,पड़ी है इस तरह ख़ाक इस तरह परवाना बरसों से। हसीनों पे ना रंग आया ना फूलों पर बहार आई,नहीं आया जो लब पे नगमा-ए-मस्ताना बरसों से।
जिसे लेना हो आ कर अब वो दरस-ए-जूनून ले ले, सुना है होश में है असगर -ए-दीवाना बरसों से।
Sunday, April 25, 2010
कृष्ण का व्यक्तित्व मानव जन्म का शिखरतम उद्घोष है। परमात्मा से हम दो तरह से चूक जाते हैं। या तो जीसस की तरह, जब हम उनको सूली पे लटका देते हैं, या फिर कृष्ण की तरह, जब हम उनको भगवान् बना के मंदिर में बिठा देते हैं। दोनों तरह से हमारे लिए आसानी हो गयी। पर ये दोनों ही मार्ग हमारे अन्दर बैठे भगवान् की हत्या के मार्ग हैं। असली क्रांति तो तभी घटती है जब कृष्ण को हम मानव रूप में देखें। तभी हम प्रयास करेंगे कि हमारी चेतना भी कृष्ण के शिखर को छू सके। कृष्ण की पूजा तो कृष्ण को निपटाने जैसा है । कृष्ण तो केवल मील का पत्थर हैं। वे तो हमारे साक्षी हैं, कृष्ण तो हमारी प्रेरणा मात्र हैं। अगर वे भगवान् बन सके, तो हम भी भगवान् हो सकते हैं। बस, इतना इशारा मात्र हैं ! वासुदेव सर्वमितिः ।
अच्छा ही है कि परमात्मा हमें नहीं मिलता। हम उसके लिए तैयार ही नहीं हैं। यूँ समझो , हम एक चाय की प्याली हैं, ओर उस पे केतली उड़ेल दो । क्या होगा? व्यर्थ का बिखराव ! हमारी चेतना के छोटे से दिए से परम की विराट ऊर्जा प्रगट नहीं होती , यह अच्छा ही है।हम जैसे हैं ,परम को handle ही नहीं कर सकते। जिस दिन हम बुलंद हो जायेंगे, परमात्मा हमें स्वयं से भर देगा। बुद्ध , कृष्ण , कबीर, नानक , फरीद, बुल्ले शाह, ....जाने कितने लोग हैं ....ऐसे बुलंद लोग जिनसे परमात्मा को पूछना ही पड़ा कि उनकी रजामंदी किस में है ! पर , पात्रता चाहिए ! पहले खुद की दृष्टि को निखारना होगा, तब परम से कोई बातचीत हो सकती है।
Wednesday, April 21, 2010
Monday, April 19, 2010
Sunday, April 18, 2010
माइल-ऐ -दैरो हरम , ये भी कभी सोचा तूने,
ज़िन्दगी खुद एक इबादत है अगर होश रहे।
मंदिर और मस्जिद में सर पटकने वालों, कभी सोचा है ? अगर होश से जियो तो सारा जीवन ही एक प्रार्थना है।
सारा खेल होश का है। मरते समय जो पीड़ा होती है मरने की नहीं होती बल्कि बेहोशी में व्यर्थ गंवाए जीवन की होती है। और होश की यात्रा अभी और इसी समय से शुरू की जा सकती है ....................असुप्ताः मुनिः ।
ज़िन्दगी खुद एक इबादत है अगर होश रहे।
मंदिर और मस्जिद में सर पटकने वालों, कभी सोचा है ? अगर होश से जियो तो सारा जीवन ही एक प्रार्थना है।
सारा खेल होश का है। मरते समय जो पीड़ा होती है मरने की नहीं होती बल्कि बेहोशी में व्यर्थ गंवाए जीवन की होती है। और होश की यात्रा अभी और इसी समय से शुरू की जा सकती है ....................असुप्ताः मुनिः ।
Saturday, April 17, 2010
Thursday, April 15, 2010
Wednesday, April 14, 2010
Tuesday, April 13, 2010
Monday, April 5, 2010
संत कवि तुलसी दास के जीवन की एक बोध कथा !
तुलसी अपनी पत्नी को अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी मायके गयी। तुलसी उनके बिना ना रह पाए। पीछे पीछे पोहोंच गए। परन्तु वे इतने कामांध थे कि रास्ते में पड़ने वाली हर बाधा को उन्होंने बिना सोचे समझे पार कर लिया। उफनती हुई यानुमा नदी को उन्होंने एक सड़ी लाश पे बैठ के पार किया। ससुराल का द्वार बंद पा कर वो पिछले दरवाज़े से घुसे। छत्त पर चढ़ने के लिए सीढ़ी ना पा केर एक सांप के सहारे वो अपनी पत्नी के कक्ष तक जा पोहोंचे। उनकी यह हालत देख कर पत्नी ने एक ताना कसा।
मरण धर्मा देह से देखी ना ऐसी प्रीत, होती जो श्री राम में होती ना तो भवभीत।
अर्थात, हड्डी मांस के इस शरीर से ऐसी ममता मैंने कभी नहीं सुनी, इतनी प्रीती अगर आपको श्रीराम से होती तो दुनिया का भय आपके ह्रदय से समाप्त हो जाता। उस दिन तुलसी ने संसार छोड़ दिया।
प्यारे मित्रों, श्री सचिन तेंदुलकर पर इतने passionate discussion में आप लोगों ने जितनी ऊर्जा लगायी है, उसका १० प्रतिशत भी आज के युवा देश की समस्याओं के लिए लगा लें तो हमारी हर समस्या सुलझ सकती है।
परमात्मा हमारे जीवन को बोधगम्य बनाये....
शिवमस्तु !
तुलसी अपनी पत्नी को अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी मायके गयी। तुलसी उनके बिना ना रह पाए। पीछे पीछे पोहोंच गए। परन्तु वे इतने कामांध थे कि रास्ते में पड़ने वाली हर बाधा को उन्होंने बिना सोचे समझे पार कर लिया। उफनती हुई यानुमा नदी को उन्होंने एक सड़ी लाश पे बैठ के पार किया। ससुराल का द्वार बंद पा कर वो पिछले दरवाज़े से घुसे। छत्त पर चढ़ने के लिए सीढ़ी ना पा केर एक सांप के सहारे वो अपनी पत्नी के कक्ष तक जा पोहोंचे। उनकी यह हालत देख कर पत्नी ने एक ताना कसा।
मरण धर्मा देह से देखी ना ऐसी प्रीत, होती जो श्री राम में होती ना तो भवभीत।
अर्थात, हड्डी मांस के इस शरीर से ऐसी ममता मैंने कभी नहीं सुनी, इतनी प्रीती अगर आपको श्रीराम से होती तो दुनिया का भय आपके ह्रदय से समाप्त हो जाता। उस दिन तुलसी ने संसार छोड़ दिया।
प्यारे मित्रों, श्री सचिन तेंदुलकर पर इतने passionate discussion में आप लोगों ने जितनी ऊर्जा लगायी है, उसका १० प्रतिशत भी आज के युवा देश की समस्याओं के लिए लगा लें तो हमारी हर समस्या सुलझ सकती है।
परमात्मा हमारे जीवन को बोधगम्य बनाये....
शिवमस्तु !
शंकर ज्ञानमार्गी व्यक्ति थे। एक व्याकरण के शिक्षक को दुक्रिन (संस्कृत भाषा का धातु) को रटते देख शंकर का ह्रदय करुणा से भर आया उन्होंने कहा, भज गोव्न्दम मूढमते, संप्राप्ते सन्निहिते काले , नहीं नहीं रक्षति दुक्रिन रटने ! गोविन्द को भज हे मूढ़ ! जब मृत्यु अपना घेरा डालेगी, व्याकरण को रटना काम ना आएगा ! ज्ञान की शुष्क धरा से प्रेम व भक्ति का ऐसा अंकुर फूटना , इस बात का प्रमाण है कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं !
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