Sunday, April 25, 2010
कृष्ण का व्यक्तित्व मानव जन्म का शिखरतम उद्घोष है। परमात्मा से हम दो तरह से चूक जाते हैं। या तो जीसस की तरह, जब हम उनको सूली पे लटका देते हैं, या फिर कृष्ण की तरह, जब हम उनको भगवान् बना के मंदिर में बिठा देते हैं। दोनों तरह से हमारे लिए आसानी हो गयी। पर ये दोनों ही मार्ग हमारे अन्दर बैठे भगवान् की हत्या के मार्ग हैं। असली क्रांति तो तभी घटती है जब कृष्ण को हम मानव रूप में देखें। तभी हम प्रयास करेंगे कि हमारी चेतना भी कृष्ण के शिखर को छू सके। कृष्ण की पूजा तो कृष्ण को निपटाने जैसा है । कृष्ण तो केवल मील का पत्थर हैं। वे तो हमारे साक्षी हैं, कृष्ण तो हमारी प्रेरणा मात्र हैं। अगर वे भगवान् बन सके, तो हम भी भगवान् हो सकते हैं। बस, इतना इशारा मात्र हैं ! वासुदेव सर्वमितिः ।
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