माइल-ऐ -दैरो हरम , ये भी कभी सोचा तूने,
ज़िन्दगी खुद एक इबादत है अगर होश रहे।
मंदिर और मस्जिद में सर पटकने वालों, कभी सोचा है ? अगर होश से जियो तो सारा जीवन ही एक प्रार्थना है।
सारा खेल होश का है। मरते समय जो पीड़ा होती है मरने की नहीं होती बल्कि बेहोशी में व्यर्थ गंवाए जीवन की होती है। और होश की यात्रा अभी और इसी समय से शुरू की जा सकती है ....................असुप्ताः मुनिः ।
Sunday, April 18, 2010
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