Monday, April 5, 2010

संत कवि तुलसी दास के जीवन की एक बोध कथा !
तुलसी अपनी पत्नी को अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी मायके गयी। तुलसी उनके बिना ना रह पाए। पीछे पीछे पोहोंच गए। परन्तु वे इतने कामांध थे कि रास्ते में पड़ने वाली हर बाधा को उन्होंने बिना सोचे समझे पार कर लिया। उफनती हुई यानुमा नदी को उन्होंने एक सड़ी लाश पे बैठ के पार किया। ससुराल का द्वार बंद पा कर वो पिछले दरवाज़े से घुसे। छत्त पर चढ़ने के लिए सीढ़ी ना पा केर एक सांप के सहारे वो अपनी पत्नी के कक्ष तक जा पोहोंचे। उनकी यह हालत देख कर पत्नी ने एक ताना कसा।
मरण धर्मा देह से देखी ना ऐसी प्रीत, होती जो श्री राम में होती ना तो भवभीत।
अर्थात, हड्डी मांस के इस शरीर से ऐसी ममता मैंने कभी नहीं सुनी, इतनी प्रीती अगर आपको श्रीराम से होती तो दुनिया का भय आपके ह्रदय से समाप्त हो जाता। उस दिन तुलसी ने संसार छोड़ दिया।
प्यारे मित्रों, श्री सचिन तेंदुलकर पर इतने passionate discussion में आप लोगों ने जितनी ऊर्जा लगायी है, उसका १० प्रतिशत भी आज के युवा देश की समस्याओं के लिए लगा लें तो हमारी हर समस्या सुलझ सकती है।
परमात्मा हमारे जीवन को बोधगम्य बनाये....
शिवमस्तु !

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