Monday, April 26, 2010

तड़पना है ना जलना है ना जल कर ख़ाक होना है, ये क्यूँ सोई हुई है फितरत-ए-परवाना बरसों से । कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे,नहीं मालूम क्यूँ खामोश है दीवाना बरसों से।

कोई सोजे तजल्ली से उसे निस्बत ना थी गोया,पड़ी है इस तरह ख़ाक इस तरह परवाना बरसों से। हसीनों पे ना रंग आया ना फूलों पर बहार आई,नहीं आया जो लब पे नगमा-ए-मस्ताना बरसों से।

जिसे लेना हो आ कर अब वो दरस-ए-जूनून ले ले, सुना है होश में है असगर -ए-दीवाना बरसों से।

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