Monday, April 5, 2010

शंकर ज्ञानमार्गी व्यक्ति थे। एक व्याकरण के शिक्षक को दुक्रिन (संस्कृत भाषा का धातु) को रटते देख शंकर का ह्रदय करुणा से भर आया उन्होंने कहा, भज गोव्न्दम मूढमते, संप्राप्ते सन्निहिते काले , नहीं नहीं रक्षति दुक्रिन रटने ! गोविन्द को भज हे मूढ़ ! जब मृत्यु अपना घेरा डालेगी, व्याकरण को रटना काम ना आएगा ! ज्ञान की शुष्क धरा से प्रेम व भक्ति का ऐसा अंकुर फूटना , इस बात का प्रमाण है कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं !

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