Tuesday, August 31, 2010
Thursday, August 26, 2010
Friday, August 20, 2010
Wednesday, August 18, 2010
Tuesday, August 17, 2010
Monday, August 16, 2010
Sunday, August 15, 2010
Wednesday, August 11, 2010
Friday, August 6, 2010
Wednesday, August 4, 2010
Tuesday, August 3, 2010
आदरणीय राजेंद्र जी,
छोट मुंह बड़ी बात होगी सर ! मेरी दृष्टि ये है कि आवाज़ देने वाला और सुनने वाला तो एक ही है, पर काव्य को जन्माने के लिए थोड़ी साहित्यिक उत्श्रन्ख्लता की अनुमति भी होनी चाहिए। दूसरे, चाहे आत्मा सुनने वाली हो या मन, या चैतन्य या प्राण ... सब शब्दों का ही भेद है। अनुभव तो अभी कोई है नहीं ! जीवन दुःख सुख की धुप छाँव में ही बीतता जाता है। मैं अपना ठीकरा आत्मा के सर फोड़ भी दूं तो क्या ? तथ्य ये है कि कष्ट तो मैं ही पा रहा हूँ।
मेरे तल पे ये कहना कि मैं सत्य जान गया हूँ , अहंकार की घोषणा होगी। इतना ही समझ में आया है कि कोई अन्दर है जो पंख फैला कर उड़ने को तत्पर है , कोई अनंत की पुकार मेरे अस्तित्व को झंकृत कर जाती है। आप सही कहते हैं...... कहने की आवश्यकता क्या है ! बस यूँ समझ लें ऊर्जा का अतिरेक है, अपना आनंद है, इसलिए बात निकलती चली जाती है... स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।
प्रेम,
ओमेन्द्र
Monday, August 2, 2010
अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ !
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़ !
रूप ,गंध,स्पर्श ,शब्द से विरस हो कर , अरूप, निशब्द, अस्पर्शित,निर्धूम से नाता जोड़ !
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ? अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़ !
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती , प्रेम और करुणा पे चढ़ के साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी ! महाशून्य के साथ सगाई तेरी रची गयी !
