Tuesday, August 31, 2010

मौन ही सघन होते होते परमात्मा बन जाता है !

Thursday, August 26, 2010

गधा ! ग = गंभीर , धा = धार्मिक । जो धर्म को अति गंभीरता से ले वो गधा ! कृष्ण नाचते, गाते, हँसते धर्म के पहले प्रणेता हैं ! Guru Gorakhnath has summed up the essence of religion like this --- हंसीबा , खेलीबा, धरीबा ध्यानम ! हंसो, खेलो, और ध्यान करो ! laugh, play and meditate ! As simple as that !

Sunday, August 22, 2010

काम के विरोध में राम नहीं मिलेंगे ... काम के पार राम मिलेंगे !

Friday, August 20, 2010

राम नाम की लूट है, लूटि सके तो लूट ! जिस धरा से भी जल बहे , हम तो नहा लेंगे मधुरिका !
मीरा ने गाया है ... आये मोरे सजना ,फिर गए अंगना , मैं रही अभागिन सोय री ... मैं जान्यो नाहिं हरि सों मिलन कैसे होय री... संतों ने तो स्पष्ट राह दिखाई है ... हम ही आंखें बंद करे पागलों की दौड़ मैं भागे जा रहे हैं !
परमात्मा तो अभी और यहीं है ... बस हम ही नहीं हैं ! कृष्ण के जीवन की ये पहली सीख हमें कृष्ण चेतना को समझने में बोहोत दूर तक जाएगी !
मेरो कछु ना बिगरैगो मोहन, लाज तिहारी जाएगी !

Wednesday, August 18, 2010

परमात्मा को हम खोजेंगे कैसे ? प्रत्येक खोज सिर्फ हमारे अहंकार को और मजबूत कर जाएगी । हमारा उस से परिचय क्या है ? वोह हमारे सामने भी आ जायेगा तो हमें प्रतिभिग्या कैसे होगी ? नहीं, परमात्मा ही हमें खोजेगा रिपु, हम तो केवल प्रतीक्षा कर सकते हैं, केवल तय्यारी कर सकते हैं उस महा प्रसाद की ! ये छोटी सी बात अगर हमें समझ में आ जाये तो पृथ्वी सही अर्थों में धार्मिक हो जाये !

Tuesday, August 17, 2010

चालबाजी नहीं समर्पण !
आस्तिकों की इस दुनिया में इतना पाप ? इतना व्यभिचार ? इतनी घृणा ? इतना वैमनस्य ? नहीं , हमसे कोई बोहोत मौलिक भूल हो रही है.... मेरे देखे वह भूल यही है, कि हम कृष्ण को पूजते तो हैं, पर जीने की हिम्मत नहीं है....जब तक हम इस पाखण्ड से नहीं छूट जाते, सम्यक मनुष्यता का विकास सम्भव नहीं !

Monday, August 16, 2010

कृष्ण करें तो लीला ,हम करें तो पाप !

Sunday, August 15, 2010

चरैवेति !चरैवेति !

Wednesday, August 11, 2010

यूँ पुकारे हैं मुझे, कूचा -ए-जानां वाले,

इधर आ बे, अबे ओ चाक गिरेबां वाले !

Friday, August 6, 2010

नैतिकता या आध्यात्म ?

Wednesday, August 4, 2010

परमात्मा कहीं बैठ के रो नहीं रहा, वोह सृजन के नृत्य में मगन है। परमात्मा को तो कोई अनुभव शेष नहीं, पर फिर भी वो परम आनंद में है , और हमसे परम राग में वह हमें बनाता ही चला जाता है। बस यही हमारी भी दशा हो सकती है।

Tuesday, August 3, 2010

आदरणीय राजेंद्र जी,

छोट मुंह बड़ी बात होगी सर ! मेरी दृष्टि ये है कि आवाज़ देने वाला और सुनने वाला तो एक ही है, पर काव्य को जन्माने के लिए थोड़ी साहित्यिक उत्श्रन्ख्लता की अनुमति भी होनी चाहिए। दूसरे, चाहे आत्मा सुनने वाली हो या मन, या चैतन्य या प्राण ... सब शब्दों का ही भेद है। अनुभव तो अभी कोई है नहीं ! जीवन दुःख सुख की धुप छाँव में ही बीतता जाता है। मैं अपना ठीकरा आत्मा के सर फोड़ भी दूं तो क्या ? तथ्य ये है कि कष्ट तो मैं ही पा रहा हूँ।

मेरे तल पे ये कहना कि मैं सत्य जान गया हूँ , अहंकार की घोषणा होगी। इतना ही समझ में आया है कि कोई अन्दर है जो पंख फैला कर उड़ने को तत्पर है , कोई अनंत की पुकार मेरे अस्तित्व को झंकृत कर जाती है। आप सही कहते हैं...... कहने की आवश्यकता क्या है ! बस यूँ समझ लें ऊर्जा का अतिरेक है, अपना आनंद है, इसलिए बात निकलती चली जाती है... स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।

प्रेम,

ओमेन्द्र

ओमेन्द्र

Monday, August 2, 2010

अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ !

महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़ !

रूप ,गंध,स्पर्श ,शब्द से विरस हो कर , अरूप, निशब्द, अस्पर्शित,निर्धूम से नाता जोड़ !

वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ? अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़ !

कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती , प्रेम और करुणा पे चढ़ के साक्षी का रस निचोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी ! महाशून्य के साथ सगाई तेरी रची गयी !

Sunday, August 1, 2010

एको विशुद्ध बोधोहमिति निश्चय्वान्हिना ।
प्रज्वाल्या ज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥
मैं एक अति शुद्ध बुद्ध रूप हूँ। ऐसे निश्चय रुपी अग्नि से अज्ञानरूपी वन को जला कर शोक रहित हुआ ,तू सुखी हो !