Monday, August 2, 2010

अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ !

महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़ !

रूप ,गंध,स्पर्श ,शब्द से विरस हो कर , अरूप, निशब्द, अस्पर्शित,निर्धूम से नाता जोड़ !

वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ? अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़ !

कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती , प्रेम और करुणा पे चढ़ के साक्षी का रस निचोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी ! महाशून्य के साथ सगाई तेरी रची गयी !

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