आस्तिकों की इस दुनिया में इतना पाप ? इतना व्यभिचार ? इतनी घृणा ? इतना वैमनस्य ? नहीं , हमसे कोई बोहोत मौलिक भूल हो रही है.... मेरे देखे वह भूल यही है, कि हम कृष्ण को पूजते तो हैं, पर जीने की हिम्मत नहीं है....जब तक हम इस पाखण्ड से नहीं छूट जाते, सम्यक मनुष्यता का विकास सम्भव नहीं !
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