आदरणीय राजेंद्र जी,
छोट मुंह बड़ी बात होगी सर ! मेरी दृष्टि ये है कि आवाज़ देने वाला और सुनने वाला तो एक ही है, पर काव्य को जन्माने के लिए थोड़ी साहित्यिक उत्श्रन्ख्लता की अनुमति भी होनी चाहिए। दूसरे, चाहे आत्मा सुनने वाली हो या मन, या चैतन्य या प्राण ... सब शब्दों का ही भेद है। अनुभव तो अभी कोई है नहीं ! जीवन दुःख सुख की धुप छाँव में ही बीतता जाता है। मैं अपना ठीकरा आत्मा के सर फोड़ भी दूं तो क्या ? तथ्य ये है कि कष्ट तो मैं ही पा रहा हूँ।
मेरे तल पे ये कहना कि मैं सत्य जान गया हूँ , अहंकार की घोषणा होगी। इतना ही समझ में आया है कि कोई अन्दर है जो पंख फैला कर उड़ने को तत्पर है , कोई अनंत की पुकार मेरे अस्तित्व को झंकृत कर जाती है। आप सही कहते हैं...... कहने की आवश्यकता क्या है ! बस यूँ समझ लें ऊर्जा का अतिरेक है, अपना आनंद है, इसलिए बात निकलती चली जाती है... स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।
प्रेम,
ओमेन्द्र

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