Sunday, May 30, 2010

नयन जो सतत ढाढस बंधाते मुस्कुराते थे, वे तीक्ष्ण चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया।

Saturday, May 29, 2010

फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा, बिखरते बादल इकठ्ठा देख , ठिठक गया।
विछोह के भय में भावों का अतिरेक , धूप छाया का ये निर्मम खेल देख , ठिठक गया ।
घोर पीड़ा में भी आयोजन यूँ साहस का, चैतन्य के अनुपम स्वरों को सुन , ठिठक गया।
मृत्यु के सामीप्य में कुछ घट गया, शाश्वत जीवन की झलक पा, अहो ! मैं निखर गया !

आकाश्वदंतोहम घटावात्प्रक्रितम जगत ।

इति ज्ञानम् तथैतस्यम ना त्यागो, ना ग्रहो लयः ।

मैं आकाशवत अनंत हूँ, संसार घड़े के सामान प्रकृति जनित है। इस कारण, इसका ना त्याग है, ना ग्रहण है, ना लय है। ऐसा ज्ञान है।

Tuesday, May 25, 2010

पिता के कांपते हाथ देख के सिहर गया , वोह ममता की ठांव बिखरते देख सिहर गया ।


जिन कन्धों पे चढ़ के जीवन देखा था, उन कन्धों को ढीलकते देख सिहर गया !


उर विशाल , धीर चित्त, निश्चल ह्रदय, धोंकनी सा सीना चलता देख सिहर गया !


नयन जो सतत ढाढस मुस्कुराताथे, वे चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया !


फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा,









Monday, May 24, 2010

दैर- ओ -हरम भी मंजिल-ए-जानां में आये थे, शुक्र है बढ़ गए अपना दामन बचा के हम !

मन्दिर और मस्जिद भी परमात्मा की खोज के रास्ते में आये थे। पर धन्यवाद हे प्रभु ! उन सब के पागलपन से बच के हम आगे निकल गए !

Sunday, May 23, 2010

अम्बा किम गोत्रोहम अस्मि ? मेरा गोत्र क्या है माँ ?

Saturday, May 22, 2010

आम आदमी को सत्य समझ में नहीं आता, स्वार्थ समझ में आता है।

Friday, May 21, 2010

(कु) जाति प्रथा ! एक कदम अन्धकार

छान्दोग्योपनिषद में एक सत्यकाम नाम के बालक की कथा का उल्लेख मिलता है।


नन्हे सत्यकाम को संन्यास की तीव्र इच्छा हुई। जब वह बालक अपने आचार्य के पास ब्रहचर्य की शिक्षा लेने गया तो आचार्य ने उस से उसका गोत्र पुछा । नन्हे बालक ने आ कर अपनी माँ से पूछा -"अम्बा, किम गोत्रोहम अस्मि ? ब्रह्मचर्यं भवतु विविद्याम। " अर्थात, माँ, मेरा गोत्र क्या है ? उसकी माँ एक दासी थी । उसने उत्तर दिया , मैं नहीं जानती पुत्र तेरा गोत्र क्या है? अपने आचार्य से कहना, तेरा नाम सत्यकाम है और तेरी माँ का नाम जाबाला है। बालक आचार्य के पास यही उत्तर ले केर गया। उसकी सत्यनिष्ठा तथा सरलता से प्रभावित हो आचार्य ने उसे शिष्य स्वीकार किया।



५००० साल पहले की भारतीय संस्कृति ने सामाजिक सहजता के वोह शिखर छुए थे, जिनसे ki





हंसा विरद सम्हाल ले, चुगे तो मोती चुग्ग,
नितर करना लंघना,जीणों कितेक जुग्ग ।
दश्त-ए-तन्हाई-ए-सेहरा में खड़ा सोचता हूँ,
हाय, क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले ।

Thursday, May 20, 2010

हंसीबा, खेलीबा, धरीबा ध्यानम । हंसो , खेलो, और ध्यान करो !
आदमी का हयात कुछ भी नहीं, बात ये है कि बात कुछ भी नहीं,
तूने सब कुछ दिया है इन्सां को, फिर भी इन्सां की ज़ात कुछ भी नहीं,
हुस्न की कायनात सब कुछ है, इश्क की कायनात कुछ भी नहीं,
आदमी पैरहम बदलता है, ये हयात-ओ मयात कुछ भी नहीं।
हयात= जीवन , कायनात= अस्तित्व, पैरहम= कपडे , मयात=मृत्यु ।

Tuesday, May 18, 2010

या रब, किसी के राज़-ए-मोहोब्बत की खैर हो ,

दस्त-ए-जुनूं रहे ना रहे, आस्तीन रहे।

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, ना होता मैं तो क्या होता !

Monday, May 17, 2010

महाभारत से एक बोध कथा। एक पंडित और उसका मित्र एक साधु से मिलने गए। पंडित अपने ज्ञान के अहंकार से भरा था । उसने साधु को प्रणाम किया और पूछा , ' महाराज , मुझे मोक्ष कब मिलेगा ? " साधु बोले- ३ जन्मों के बाद। पंडित उदास हो गया । पंडित के मित्र ने भी डरते डरते पूछा- और महाराज मुझे? साधु एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ थे। साधु बोले- जितने पत्ते इस पीपल की शाखाओं पे लगे हैं ,उतने जन्मों के बाद। वह व्यक्ति नाचने लगा । पंडित और साधु ने उस से पूछा, तुम निराश नहीं हो? अभी तुम्हारा मोक्ष कितना दूर है ! उस व्यक्ति ने कहा, मैं आनंदित हूँ कि मुझे मोक्ष मिलेगा। मेरी पात्रता कहाँ थी , यह तो परमात्मा की असीम अनुकम्पा है कि बस इतने से जन्मों के बाद मुझ जैसे को भी मोक्ष मिलेगा। उसी क्षण आकाशवाणी हुई - वत्स, तुझे इसी क्षण मोक्ष मिलता है। तू आज से , अब से मुक्त है।
अज्ञानी तो अंधकार में भटकता ही है, ग्यानी महान्धकार में भटक जाता है --उपनिषदों से।

दर्द इतना था कि ज़ख्मों से गवाही ना हुई,

तेरे आने पे दिल की रुसवाई ना हुई ।

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़साने,
ये और बात है दुनिया नज़र ना पहचाने,
किस से कहिये दर्द की लज्ज़त यहाँ कौन जाने ,
अफ़सोस !खोजते हैं सब सतह पे ज़िन्दगी के माने।
सुनी दसकंधर वचन तब, कुम्भ्करन बिलखान , जगदम्बा हरी आनी शठ, अब चाहत कल्यान।

Sunday, May 16, 2010

वचन कर्म मन कपट तजि ,भजेहु राम रघुबीर।
जाहू ना निज पर सूझ मोहि, भयहूँ काल बस बीर॥

Saturday, May 15, 2010

अहिंसा परमो धर्मः ,हिंसा आपद धर्मः ।

Friday, May 14, 2010

सीतहि सभय देखी रघुराई ! कहा अनुज सन सयन बुझाई॥

Monday, May 10, 2010

जो ढोवत अस भार, सो किमी झोंकत भार अस,
रहिमन उतरे पार, भार झोंकी सब भार में !

Sunday, May 9, 2010

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं,

रहिमन दाहे प्रेम के , बुझि बुझि के सुलगाहिं ।
कहो रहीम कहाँ सीखी ,ऐसी उलटी बैन,
ज्यूँ ज्यूँ कर ऊंचे करो, त्यूँ त्यूँ नीचे नैन।

देनहार कोई ओर है देत रहत दिन रैन ,
लोग भरम मोपे करें ,ताते नीचे नैन।

Saturday, May 8, 2010

जोड़ ले हाथों से हाथ एक दूजे से कस कर , के यारों की महफ़िल यूँ फिर ना सजेगी ,
पी ले जी भर के नूर छलकती आंख का भी , के यौवन की मधुशाला फिर ना जगेगी,
तू दुनिया के नगमों को सुन कान रख के, फिर सुनना भी चाहे ये कुछ ना कहेगी,
है वो खुश नसीब आँख उठी जिसकी ऊपर, ये चांदी की खन खन तो यूँ ही बजेगी,
वक़्त है जोड़ ले आलम -ए-रंग से हस्ती, ये दुनिया तो गाफिल थी गाफिल रहेगी।

Friday, May 7, 2010

अब रहीम मुश्किल पड़ी ,गाढे दोउ काम,
सांच कहें तो जग नहीं , झूठे मिले ना राम।

Sunday, May 2, 2010

अहो निरंजनः शान्तो बोधोहम प्रक्रितेह परः । एतावंत्महम कालम मोहेनैव विदाम्बितः ।

मैं निर्दोष हूँ ? शांत हूँ? बोध रूप हूँ? प्रकृति से परे हूँ ? आश्चर्य ! मैं इतने काल अज्ञान करके निस्संदेह ठगा गया हूँ। ----अष्टावक्र महागीता में जनक के वचन अष्टावक्र को।

अक्ल की सतह से कुछ ओर गुज़र जाना था, इश्क को मंजिल-ए-परस्ती से गुज़र जाना था,

ये तो क्या कहिये चला था मैं कहाँ से हमदम, मुझको ये भी ना था मालूम किधर जाना था ।

बुद्धि जानती क्या है ? बुद्धि की पोहोंच कहाँ तक है? बस कोल्हू के बैल की तरह हमें हांके चले जाती है !