पिता के कांपते हाथ देख के सिहर गया , वोह ममता की ठांव बिखरते देख सिहर गया ।
जिन कन्धों पे चढ़ के जीवन देखा था, उन कन्धों को ढीलकते देख सिहर गया !
उर विशाल , धीर चित्त, निश्चल ह्रदय, धोंकनी सा सीना चलता देख सिहर गया !
नयन जो सतत ढाढस मुस्कुराताथे, वे चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया !
फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा,
Tuesday, May 25, 2010
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