Tuesday, May 25, 2010

पिता के कांपते हाथ देख के सिहर गया , वोह ममता की ठांव बिखरते देख सिहर गया ।


जिन कन्धों पे चढ़ के जीवन देखा था, उन कन्धों को ढीलकते देख सिहर गया !


उर विशाल , धीर चित्त, निश्चल ह्रदय, धोंकनी सा सीना चलता देख सिहर गया !


नयन जो सतत ढाढस मुस्कुराताथे, वे चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया !


फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा,









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