अहो निरंजनः शान्तो बोधोहम प्रक्रितेह परः । एतावंत्महम कालम मोहेनैव विदाम्बितः ।
मैं निर्दोष हूँ ? शांत हूँ? बोध रूप हूँ? प्रकृति से परे हूँ ? आश्चर्य ! मैं इतने काल अज्ञान करके निस्संदेह ठगा गया हूँ। ----अष्टावक्र महागीता में जनक के वचन अष्टावक्र को।

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