अक्ल की सतह से कुछ ओर गुज़र जाना था, इश्क को मंजिल-ए-परस्ती से गुज़र जाना था,
ये तो क्या कहिये चला था मैं कहाँ से हमदम, मुझको ये भी ना था मालूम किधर जाना था ।
बुद्धि जानती क्या है ? बुद्धि की पोहोंच कहाँ तक है? बस कोल्हू के बैल की तरह हमें हांके चले जाती है !
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