छान्दोग्योपनिषद में एक सत्यकाम नाम के बालक की कथा का उल्लेख मिलता है।
नन्हे सत्यकाम को संन्यास की तीव्र इच्छा हुई। जब वह बालक अपने आचार्य के पास ब्रहचर्य की शिक्षा लेने गया तो आचार्य ने उस से उसका गोत्र पुछा । नन्हे बालक ने आ कर अपनी माँ से पूछा -"अम्बा, किम गोत्रोहम अस्मि ? ब्रह्मचर्यं भवतु विविद्याम। " अर्थात, माँ, मेरा गोत्र क्या है ? उसकी माँ एक दासी थी । उसने उत्तर दिया , मैं नहीं जानती पुत्र तेरा गोत्र क्या है? अपने आचार्य से कहना, तेरा नाम सत्यकाम है और तेरी माँ का नाम जाबाला है। बालक आचार्य के पास यही उत्तर ले केर गया। उसकी सत्यनिष्ठा तथा सरलता से प्रभावित हो आचार्य ने उसे शिष्य स्वीकार किया।
५००० साल पहले की भारतीय संस्कृति ने सामाजिक सहजता के वोह शिखर छुए थे, जिनसे ki

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