Wednesday, June 30, 2010

मस्जिद तो बना दी इक शब में, इमां की हरारत वालों ने,
पर मन ये पुराना पापी था बरसों में नमाज़ी हो ना सका।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मत्रिप्ताश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं ना विद्यते ॥
जो मुष्य आत्मा में रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा संतुष्ट हो , उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाक्रितेनेंह कशचानाह ।
ना चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदार्थ्व्यपाश्राया ॥
उस महापुरुष को ना तो कर्म से कोई प्रयोजन रहता है, और ना कर्मों के ना करने से,तथा संपूर्ण प्राणियों में भी, इसका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
श्रीमद्भगवद्गीता , तृतीय अध्याय। श्लोक १७ व १८.

Tuesday, June 29, 2010

मय्यिअनन्त महाम्बोधो विश्वपोत इतस्तः ।
भ्रमति स्वान्त्वातैन न ममास्त्य सहिष्णुता ॥
मुझ अनंत महासागर में विश्व रुपी नौका , मन रुपी पवन के ज़ोर से इधर उधर डोलती है, परन्तु , इससे मुझको असहिष्णुता नहीं है। यूँ कहें दादा , प्रकृति के गुणों से संचालित यह संसार अपनी ही गति से इधर उधर डोलता है। मुझ चैतन्य के महासागर को उस से क्या लेना देना !

Monday, June 28, 2010

पञ्च भूतों का शरीर आज नहीं कल पञ्च भूतों में ही लीन होगा , पर यदि हमारे सदगुरुओं के वचनों को प्रामाणिक माना जाये तो चैतन्य अपनी अमर यात्रा पर ही रहता है।

Sunday, June 27, 2010

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहम बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किन्चिनमा गृहाण विमुंच माँ ॥
जब मैं हूँ तब बन्ध है, जब मैं नहीं हूँ मोक्ष है , इसी प्रकार मान कर ,इच्छा कर, ना तो ग्रहण कर और ना त्याग कर ! - अष्टावक्र के वचन जनक को।

Saturday, June 19, 2010

रस्मो-रिवाज वो निभाएं जिन्हें गरज हो दुनिया वालों से,
ना रुसवाई का कोई डर था ना था खौफ पशेमान होने से ,
खुद को मिटाने की कसम पे चले हैं वफ़ा के दीवाने ,
आजमाना हो खुद को तो खोलते हैं हम सफीना , या फिर,
बस दामन बचा के निकल जा जुनूं के सैलाब वालों से।

हंसा विरद सम्हाल ले, चुगे तो मोती चुग्ग , नितर करना लंघना , जीणों कितेक जुग्ग ।

हे हंसा, अपने स्वरुप को सम्हाल, भूख लगने पर केवल मोती चुनना , नहीं तो भूखे मरना अच्छा, अंततः तू कोई युगों तक तो जीने आया नहीं।

Wednesday, June 16, 2010

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा, मैं तो दरिया हूँ समंदर में उतर जाऊंगा।

तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊंगा,घर में घिर जाऊंगा सेहरा में बिखर जाऊंगा।

अब तेरे शहर में आऊँगा मुसाफिर की तरह, साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊंगा।

ज़िन्दगी शमा की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम', बुझ जाऊंगा मगर सेहर तो कर जाऊंगा।

Saturday, June 12, 2010

आसमां आज भी नालों से हिला सकता हूँ,

मैं जो खामोश हूँ , इसका भी सबब है कोई !