मस्जिद तो बना दी इक शब में, इमां की हरारत वालों ने,
पर मन ये पुराना पापी था बरसों में नमाज़ी हो ना सका।
Wednesday, June 30, 2010
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मत्रिप्ताश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं ना विद्यते ॥
जो मुष्य आत्मा में रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा संतुष्ट हो , उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाक्रितेनेंह कशचानाह ।
ना चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदार्थ्व्यपाश्राया ॥
उस महापुरुष को ना तो कर्म से कोई प्रयोजन रहता है, और ना कर्मों के ना करने से,तथा संपूर्ण प्राणियों में भी, इसका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
श्रीमद्भगवद्गीता , तृतीय अध्याय। श्लोक १७ व १८.
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं ना विद्यते ॥
जो मुष्य आत्मा में रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा संतुष्ट हो , उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाक्रितेनेंह कशचानाह ।
ना चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदार्थ्व्यपाश्राया ॥
उस महापुरुष को ना तो कर्म से कोई प्रयोजन रहता है, और ना कर्मों के ना करने से,तथा संपूर्ण प्राणियों में भी, इसका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
श्रीमद्भगवद्गीता , तृतीय अध्याय। श्लोक १७ व १८.
Tuesday, June 29, 2010
मय्यिअनन्त महाम्बोधो विश्वपोत इतस्तः ।
भ्रमति स्वान्त्वातैन न ममास्त्य सहिष्णुता ॥
मुझ अनंत महासागर में विश्व रुपी नौका , मन रुपी पवन के ज़ोर से इधर उधर डोलती है, परन्तु , इससे मुझको असहिष्णुता नहीं है। यूँ कहें दादा , प्रकृति के गुणों से संचालित यह संसार अपनी ही गति से इधर उधर डोलता है। मुझ चैतन्य के महासागर को उस से क्या लेना देना !
भ्रमति स्वान्त्वातैन न ममास्त्य सहिष्णुता ॥
मुझ अनंत महासागर में विश्व रुपी नौका , मन रुपी पवन के ज़ोर से इधर उधर डोलती है, परन्तु , इससे मुझको असहिष्णुता नहीं है। यूँ कहें दादा , प्रकृति के गुणों से संचालित यह संसार अपनी ही गति से इधर उधर डोलता है। मुझ चैतन्य के महासागर को उस से क्या लेना देना !
Monday, June 28, 2010
Sunday, June 27, 2010
Saturday, June 19, 2010
Wednesday, June 16, 2010
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