Wednesday, June 30, 2010

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मत्रिप्ताश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं ना विद्यते ॥
जो मुष्य आत्मा में रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा संतुष्ट हो , उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाक्रितेनेंह कशचानाह ।
ना चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदार्थ्व्यपाश्राया ॥
उस महापुरुष को ना तो कर्म से कोई प्रयोजन रहता है, और ना कर्मों के ना करने से,तथा संपूर्ण प्राणियों में भी, इसका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
श्रीमद्भगवद्गीता , तृतीय अध्याय। श्लोक १७ व १८.

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