Tuesday, June 29, 2010

मय्यिअनन्त महाम्बोधो विश्वपोत इतस्तः ।
भ्रमति स्वान्त्वातैन न ममास्त्य सहिष्णुता ॥
मुझ अनंत महासागर में विश्व रुपी नौका , मन रुपी पवन के ज़ोर से इधर उधर डोलती है, परन्तु , इससे मुझको असहिष्णुता नहीं है। यूँ कहें दादा , प्रकृति के गुणों से संचालित यह संसार अपनी ही गति से इधर उधर डोलता है। मुझ चैतन्य के महासागर को उस से क्या लेना देना !

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