Wednesday, June 16, 2010

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा, मैं तो दरिया हूँ समंदर में उतर जाऊंगा।

तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊंगा,घर में घिर जाऊंगा सेहरा में बिखर जाऊंगा।

अब तेरे शहर में आऊँगा मुसाफिर की तरह, साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊंगा।

ज़िन्दगी शमा की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम', बुझ जाऊंगा मगर सेहर तो कर जाऊंगा।

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