अश्रद्धा में लाभ हो जाये तो भी दो कौड़ी का है, क्यूंकि अश्रद्धा हमें कृपण बना कर जाएगी। श्रद्धा में हानि भी हो जाये तो हानि नहीं है, क्यूंकि हमने श्रद्धा की, तो हम रूपांतरित हो जायेंगे। कबीर तो कहते ही हैं ... सहज मिले अविनाशी ... पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवे हांसी।
No comments:
Post a Comment