चलो अब किसी और के सहार लोगों , बड़े खुदगर्ज़ हो गए हैं किनारे लोगों !
सहारा समझ के खड़े हो साए में जिनके , ढह पड़ेंगी अचानक ये दीवारें लोगों !
क्या गुजरेगी सफीने पे खबर नहीं ,अंधड़ से मिल गयीं हैं पतवारें लोगों !
हज़ारों बेबस आहें दफ़न हैं यहाँ , मेहेज़ पत्थरों के ढेर नहीं ये मजारें लोगों !
Thursday, September 30, 2010
Saturday, September 25, 2010
मन के अनुसंधान समझ, शंब्दों के परिधान पहन ...ये कौन आह जगी ?
शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ....ये कौन आह जगी ?
बोध के वर्तुल से मुक्त, मात्र चैतन्य से युक्त, जलाती उष्णता में हल्की बयार सी.... ये कौन आह जगी ?
स्वत्व को विस्तीर्ण करती, अहम् जीर्ण जीर्ण करती, माँ की फटकार सी ....ये कौन आह जगी ?
स्थित अपनी नग्नता में, निश्चिन्त अपनी मग्नता में , शिशु की किलकार सी...ये कौन आह जगी ?
शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ....ये कौन आह जगी ?
बोध के वर्तुल से मुक्त, मात्र चैतन्य से युक्त, जलाती उष्णता में हल्की बयार सी.... ये कौन आह जगी ?
स्वत्व को विस्तीर्ण करती, अहम् जीर्ण जीर्ण करती, माँ की फटकार सी ....ये कौन आह जगी ?
स्थित अपनी नग्नता में, निश्चिन्त अपनी मग्नता में , शिशु की किलकार सी...ये कौन आह जगी ?
Friday, September 24, 2010
जो रो ना सके वो जवानी क्या ! जो हंस ना सके वो बुढापा क्या !
जो चल ना सके वो हौसला क्या ! जो मिट ही जाये वो फासला क्या !
जो जला ना दे वो आशिकी क्या ! जो मिटा ना दे वो बंदगी क्या !
होश वो सम्हालें जिन्हें फुर्सत , जो लुटा ना दे वो बेखुदी क्या !
जिसे जिया ना जाये वो क़ज़ा क्या ! जो मरना ना सिखाये वो ज़िन्दगी क्या !
बौनों की बस्ती पे क्या पीठ ठोकें ! जो फ़रिश्ता ना बने वो आदमी क्या !
पापा , होश में मरना है , ताकि अगला जन्म आप स्वेच्छा से ले सकें ... होश में प्राण त्यागने हैं ... पापा की पलकें बंद थीं ... वोह बस गर्दन से हाँ का इशारा करते रहते थे ...कठिन काम था ... रुंधे गले से अपने पिता को मरने की सलाह देना ... पर मैंने ७ दिन तक ये प्रयोग किया... मुझे नहीं पता पापा ने होश में देहत्याग किया या नहीं ... पर यदि मृत्यु के पार भी जीवन है तो कदाचित यह प्रयोग पापा के काम आया हो !
Thursday, September 23, 2010
अंत में तोः खुदा और भगवान् एक ही सत्ता का नाम है ... पर हम अभी अंत में पोहोंचे नहीं है ! जहां हम खड़े हैं वहाँ चाहे मार्ग का ही सही, पर भेद है.... सभी मार्ग सुन्दर हैं... शुभ हैं... तुम्हें तुम्हारा मार्ग मुबारक... मुझे मेरा... जब मंजिल पे मिलेंगे तब देखी जाएगी... यह संसार सुन्दर ही इसलिए है कि यहाँ अलग अलग किस्म के फूल खिले हैं... हिन्दू अपनी खुशबू बिखेरे, इस्लाम अपनी, इसाईयत अपनी..... तुम्हारी भी जय जय , हमारी भी जय जय ! पर जब तक हम इस भेद की दुनिया में जी रहे हैं ... एक दुसरे का सम्मान ही खुशहाली का मार्ग है ! कोई किसी को नीचा ना दिखाए.... वरना हम यहीं लड़ मर के नष्ट हो जायेंगे ! ना खुदा ही मिला , ना विसाले सनम ! ना इधर के रहे ना उधर के रहे !
सारी बात की कुंजी इसी अनुभव में छुपी है कि हम अपने आस पास की घटनाओं से क्या सीखते हैं ! जीवन और मृत्यु दोनों ही हमारे बस के परे हैं ... पर हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में है ... सच पूछें तो केवल दृष्टिकोण ही हमारे हाथों में है ... घटनाएं तो स्वतः घटती हैं... हम बेबस हैं ... अब सवाल ये है कि हम क्या करें ? या तो इस बेबसी का रोना रोयें या अपना नजरिया ही सम्हाल लें । पापा ने अपने जीवन और मृत्यु दोनों में मुझे बोहोत कुछ सिखाया ... इसलिए , मैंने सोचा...ऐसे मीठे व्यक्ति की मृत्यु को रोने धोने का उपक्रम नहीं बनाना है .. प्रेम से जीया हूँ,,, प्रेम से ही उन्हें विदा भी करूँगा.... बस तभी यह पंक्तियाँ मुझ पे उतर आयीं ..... मृत्यु इतनी भयावह नहीं है जितनी हम उसे समझे बैठे हैं... ये पंक्तियाँ मैंने कविता के लिए नहीं लिखी हैं ... वाकई मुझ पे बीती है... पहले, पापा को खोने का भय... फिर, एक क्षण के ठहराव और मैंने मृत्यु का थोडा गहरा निरीक्षण किया... और अंत में, जब बात समझ में आई तो भय गया और मन निर्भार हो गया ! .....शुभमस्तु !
Wednesday, September 22, 2010
ध्यायतो विषयान्पुंसः संग्शूप्जायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोभिजायते ॥
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है । और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध आता है ।
क्रोधाद्भावती सम्मोहः सम्मोहात्स्म्रितिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात प्रनश्यती ॥
क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है, मूढ्भाव से स्मृति भ्रम में पड़ जाती है, स्मृति के भ्रमित होने बुद्धि का नाश होता है , और बुद्धि का नाश होने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है ।
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है । और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध आता है ।
क्रोधाद्भावती सम्मोहः सम्मोहात्स्म्रितिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात प्रनश्यती ॥
क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है, मूढ्भाव से स्मृति भ्रम में पड़ जाती है, स्मृति के भ्रमित होने बुद्धि का नाश होता है , और बुद्धि का नाश होने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है ।
Thursday, September 16, 2010
Wednesday, September 15, 2010
Tuesday, September 14, 2010
Friday, September 3, 2010
खेल की तरह जीवन जीना हिन्दू विचारधारा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खोजों में से एक है । खेल में एक हल्कापन होता है, खेलना एक निर्भार स्थिति है... पर मनुष्यता इतनी उलटी हो गयी है कि हम तो खेल को भी एक गंभीर विषय बना लिए हैं... खेल का जीवन में एक आध्यात्मिक उपयोग है... जिस तरह खेल खेलते हुए हम जानते हैं कि खेल पूरा हो जाने पे कोई दोस्त दुश्मन नहीं होगा... ऐसा ही तो हमारा जीवन भी होना चाहिए... ज़र, ज़मीन और जोरू के लिए आदमी कितनी मार काट करता है ! अगर ये सब एक खेल की तरह खेला जाये तो कौन पागल इन मरी हुई चीज़ों के लिए लडेगा ? इसीलिए तो कृष्ण के जीवन को हमने लीला कहा है... इसीलिए तो कृष्ण घोर संकट की स्थिति में भी हम पे हँसते ही नज़र आते हैं....
रोते , शिकायत भरे चित्त से परमात्मा का खुला द्वार भी बंद हो जायेगा ... परम के द्वार तो उसी के लिए खुले हैं जो हँसता ,गाता, नाचता वहाँ जायेगा !
रोते , शिकायत भरे चित्त से परमात्मा का खुला द्वार भी बंद हो जायेगा ... परम के द्वार तो उसी के लिए खुले हैं जो हँसता ,गाता, नाचता वहाँ जायेगा !
Thursday, September 2, 2010
Wednesday, September 1, 2010
Subscribe to:
Comments (Atom)
