चलो अब किसी और के सहार लोगों , बड़े खुदगर्ज़ हो गए हैं किनारे लोगों !
सहारा समझ के खड़े हो साए में जिनके , ढह पड़ेंगी अचानक ये दीवारें लोगों !
क्या गुजरेगी सफीने पे खबर नहीं ,अंधड़ से मिल गयीं हैं पतवारें लोगों !
हज़ारों बेबस आहें दफ़न हैं यहाँ , मेहेज़ पत्थरों के ढेर नहीं ये मजारें लोगों !
Thursday, September 30, 2010
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