Friday, September 3, 2010

खेल की तरह जीवन जीना हिन्दू विचारधारा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खोजों में से एक है । खेल में एक हल्कापन होता है, खेलना एक निर्भार स्थिति है... पर मनुष्यता इतनी उलटी हो गयी है कि हम तो खेल को भी एक गंभीर विषय बना लिए हैं... खेल का जीवन में एक आध्यात्मिक उपयोग है... जिस तरह खेल खेलते हुए हम जानते हैं कि खेल पूरा हो जाने पे कोई दोस्त दुश्मन नहीं होगा... ऐसा ही तो हमारा जीवन भी होना चाहिए... ज़र, ज़मीन और जोरू के लिए आदमी कितनी मार काट करता है ! अगर ये सब एक खेल की तरह खेला जाये तो कौन पागल इन मरी हुई चीज़ों के लिए लडेगा ? इसीलिए तो कृष्ण के जीवन को हमने लीला कहा है... इसीलिए तो कृष्ण घोर संकट की स्थिति में भी हम पे हँसते ही नज़र आते हैं....
रोते , शिकायत भरे चित्त से परमात्मा का खुला द्वार भी बंद हो जायेगा ... परम के द्वार तो उसी के लिए खुले हैं जो हँसता ,गाता, नाचता वहाँ जायेगा !

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