Thursday, September 23, 2010

सारी बात की कुंजी इसी अनुभव में छुपी है कि हम अपने आस पास की घटनाओं से क्या सीखते हैं ! जीवन और मृत्यु दोनों ही हमारे बस के परे हैं ... पर हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में है ... सच पूछें तो केवल दृष्टिकोण ही हमारे हाथों में है ... घटनाएं तो स्वतः घटती हैं... हम बेबस हैं ... अब सवाल ये है कि हम क्या करें ? या तो इस बेबसी का रोना रोयें या अपना नजरिया ही सम्हाल लें । पापा ने अपने जीवन और मृत्यु दोनों में मुझे बोहोत कुछ सिखाया ... इसलिए , मैंने सोचा...ऐसे मीठे व्यक्ति की मृत्यु को रोने धोने का उपक्रम नहीं बनाना है .. प्रेम से जीया हूँ,,, प्रेम से ही उन्हें विदा भी करूँगा.... बस तभी यह पंक्तियाँ मुझ पे उतर आयीं ..... मृत्यु इतनी भयावह नहीं है जितनी हम उसे समझे बैठे हैं... ये पंक्तियाँ मैंने कविता के लिए नहीं लिखी हैं ... वाकई मुझ पे बीती है... पहले, पापा को खोने का भय... फिर, एक क्षण के ठहराव और मैंने मृत्यु का थोडा गहरा निरीक्षण किया... और अंत में, जब बात समझ में आई तो भय गया और मन निर्भार हो गया ! .....शुभमस्तु !

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