Thursday, September 2, 2010

तुभ्यं वस्तु गोविन्दम । तुभ्यं समर्पये ! तेरा तुझको अर्पण ,क्या लागे मेरा ! जिस अज्ञात से चैतन्य की यात्रा आरम्भ होती है...और जहां हमें लीन हो जाना है ...उसकी ज़रा सी पहचान हो जाये ..बस पर्याप्त है ! ....फिर कैसा भय ? कैसी चिंता ?

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