Wednesday, September 22, 2010

पञ्च भूतों से गढ़ा यह शरीर अपने कर्मों से निवृत्त हो कर पञ्च भूतों में ही लीन होना है, असल बात चैतन्य की है... हम उसकी यात्रा में सहभागी होते हैं या उसके मार्ग का रोड़ा बनते हैं !

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