Friday, December 17, 2010


उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में ,निश्चिंत !
क्या करूं अतिक्रमण ,ठिठक के रह जाऊं ,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,...
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं !

Friday, November 19, 2010

जागिये ! आप भी देवता हैं !
तत त्वम् असि श्वेतकेतु ! तू भी तत्व रूप से वोही ब्रह्म है श्वेतकेतु !

Thursday, November 18, 2010

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आये ,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आये ...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने ,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने ,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना ,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना ,
कितने भटके हुओं को उबार लाये

इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना ,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए !

Monday, November 15, 2010

पंछियों की इक कतार ,क्षितिज से जन्मी , क्षितज में खो गयी,
बस एक क्षण में चित्त की सारी मलिनता धो गयी ..

Sunday, November 14, 2010

वो क्या है श्रीजा ..... की जब महासागर में गोते लगाने का स्वाद आ गया हो तो पोखर और तालाब आकर्षित नहीं करते ...

Saturday, November 13, 2010

ठोकरें खा कर भी ना सम्हले ये मुसाफिर का नसीब ,
राह के पत्थर ने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया !
थक गई है आँख कर कर के जुस्तुजू,
कोई जियाला नज़र मिलाये भी तो !
तकल्लुफ की दीवार कोई लांघता नहीं,
हौसला भी मेरा कोई आजमाए तो !

Thursday, November 11, 2010


मन री परतां ऊंडी बोहोत ,
कयां होवे इण मन री मोत,
मन्न मरे इने लाय लगावाँ,
तब होवे मन जल रो सोत॥
ग़लत नहीं थी ये बात, के वो है तुम्हारे पास ।
पर इन हाथों से ना पकड़ पाओगी उसके हाथ ।
कुनकुने विश्वास से बिगड़ी बात ना बनेगी ।
फूल सी यह ज़िन्दगी कुम्हलाई ही रहेगी ।
बदल अपनी आँख , स्वयं को रूपांतरित कर लो।
वो ही है सब ऑर, खाली झोलियाँ भर लो ।
हवा का झोंका भी फिर तुझे सम्हाल जायेगा ।
स्वर्ग कहीं और नहीं , धरती पे उतर आयेगा । ..शुभमस्तु !




Wednesday, November 10, 2010

उभरते भावों को शब्दों से समझाना था , कहने सुनने से क्या बात बनती ? गाफिल ज़माना था !
उपजता कुछ, मैं कहता कुछ , वो सुनते कुछ ,समझते कुछ ! ताश के पत्तों का महल इक बनाना था !
लौट लौट पड़ती मेरी चिल्लाहट मेरे ही चैतन्य पर , तूफानों के साये में मोमबत्तियां जलाना था !
प्रेम था, अपनत्व भी , करुणा भी थी , ममत्व भी , शब्दों की फूटी नाव से मगर, पार इन्हें लगाना था !
कौन किसकी सुनता है यहाँ ओमी ? सबको इक कुंठित ह्रदय से अपना धुंआ छितराना था !
बढ़ के कोई भी किसी के पोंछता आंसूं नहीं, अपने दुखों के बोझ से क्या सबको यूँ मर जाना था ?
बैठ अपने साथ , थोडा सा स्वयं को आराम दे, शोर के उस पार की आवाज़ भी तो पाना था !
झाँक मेरी आँख में , मेरी गर्मी को महसूस कर, तुझमें मुझमें भी कोई अपना , कोई बेगाना था ?

Tuesday, November 9, 2010

पीपल के सूखे पत्तों की नाड़ियाँ आकाश ने है आंक डालीं वही शून्यता ...वही कौतूहल वही जाली

सूखे पत्तों की आहट से जाग उठा माली ... पकड़ी गयी पिया से मिलने गयी लाली ... लाज से मुंह ढंकने को पकड़ी डाली ... ना शून्यता , ना कौतूहल ... वही जाली !

पानी में मीन पियासी ... मोहे सुन सुन आवे हांसी ....
परमात्मा के जल में रह कर भी हम प्यासे मरे जा रहे हैं ... बात तो हंसने जैसी ही है ... !

Saturday, November 6, 2010

नो तो भोगने से, ना भागने से, .... केवल जागने से बात बनेगी !

Thursday, November 4, 2010

विशयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरानार्थिनाह ।


विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधे एकाग्र्सिद्धाये ॥

विषय रुपी हाथियों से डर कर, मूढ़ पुरुष, अपनी रक्षा हेतु , चित्त की एकाग्रता व निरोधिता की सिद्धि के लिए , शीघ्रता से पहाड़ों की गुफाओं में प्रवेश कर जाते हैं ।

निर्वासनं हरिम दृष्ट्वा तूश्निम विशय्दंतिनाह ।

पलायन्ते ना शक्तास्ते ,सेवन्ते कृत चाटवः ॥

वासना रहित पुरुष रुपी सिंह को देख कर असमर्थ हुए विषय रुपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं , स्वयं में स्थित हुआ वह वासना रहित पुरुष ,इश्वर से अष्टावक्र गीता इस जगत का सेवन करता है ! ( Ashtavakra Geeta )

Wednesday, November 3, 2010

जो तुमने जंगल में रह कर पाया वो राजमहल में ना पा सकते थे ? कहते हैं ... जीवन में पहली, और आखरी बार , बुद्ध निरुत्तर हुए !
यदि मैं शून्य हूँ और तुम भी शून्यतोशब्दों का क्या प्रयोजन?...
क्यूंकि शब्द अब भी रिझाते हैं ... निःशब्द की भाषा से पहचान कहाँ ?
अहंकार के वर्तुल से आसक्त .... शून्य मात्र शब्द है , संधान कहाँ ?

Monday, November 1, 2010

बूंद की पूर्ण पारदर्शिता में निहित है
इन्द्रधनुष का अपव्यय
गुज़रता है प्रकाश मध्य से
विखंडित होता अनगिनत रंगों में
प्रत्येक रंग के पीछे है पारदर्शिता
प्रच्छन्न अपनी ही प्रांजलता से !
हर तरफ खुदा ही जलवानुमा है, बस देखने वाली नज़र चाहिए ॥
उसका होना होता है ज़ाहिर भी , दिल में जुनूं तो मगर चाहिए ॥
तारे हुस्न ज़िन्दगी सभी हैं, और क्या तुझे उसकी खबर चाहिए ॥
वो तुझमें भी है और मुझमें भी, तलाश में बस असर चाहिए ॥
कुलबुलाने से बात बनेगी नहीं , इंसानियत को एक ग़दर चाहिए ॥
वो बयान है तेरे होने ही में , ये सीधी बात समझे वो सर चाहिए ॥

Sunday, October 31, 2010

ये सारा जिस्म झुक कर. बोझ से दोहरा हुआ होगा ।

मैं सजदे में नहीं था ,आपको धोखा हुआ होगा ॥

Friday, October 29, 2010

आदि सत्य की सरल ,सशक्त अभिव्यक्ति !

Monday, October 25, 2010

मरो, हे जोगी मरो ! मरने से पहले मरो !
विरोधाभास ! किन्तु मृत्यु है इस तन की सर्वाधिक अन्तरंग घटना !
मरण इतना मीठा लगा , कि पुनः पुनः ले उसका चुम्बन ... मरने से पहले ही मैंने हज़ार बार मरने का स्वाद चखा !
"मरने से पहले मरो !" ... यूँ फरमा गए हजरत मोहम्मद भी !
भयभीत पंखों ने क्या सूरज को ललकारा है ?
वोह सब जो डराता था , जब प्रेममय हुआ , .... तभी मेरा पुनर्जन्म हुआ !
( महान सूफी संत राबिया से अनूदित )
तुझसे एक दर्द का रिश्ता भी है, बस प्यार नहीं , अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे ।
तू जहां जाती है , जा ! रोकने वाला मैं कौन , रस्ते रस्ते में ज़रा शमा जला लेने दे ॥

Sunday, October 24, 2010

बस एक गुनाह-ए-अज़ीम, शेखो पंडित ने है किया ।
मंजिल का कुछ पता ना था, राह बताये किया !

Wednesday, October 20, 2010

अल्लाह की और नज़र उठे तो प्यार से, जैसे , हम अपने पिता के पास जाते हैं , उस तरह से ... अपना दिमाग बाहर छोड़ कर ! उसने जन्म क्यूँ दिया ? वोह क्यूं मौत देता है ? पाप और पुण्य क्या हैं ? क़यामत के रोज़ जन्नत मिलेगी या जहन्नुम ? यह सब फ़िज़ूल की बातें दरवाजे पे छोड़ के जाना पड़ेगा ।
ये जगत एक विराट महाकाव्य है , जिसका ना ओर है ना कोई छोर , हमारी बचकानी बुद्धि से हम इसे समझ नहीं सकते ... हमें विराट को समझने के लिए, विराट ही ऊर्जा और दृष्टि चाहिए .... उसके लिए संकल्प और समर्पण ...दो पंख चाहियें ... फिर थोडा सत्संग हो जाये .... बस ! फिर द्वार खुल गए !
हम ही बाधा हैं , अल्लाह हमें अपने दीदार करवाने को हमसे भी ज्यादा बेताब है !
मौजों की सियासत से परेशान ना हो फानी ।
गिर्दाब की हर तह में साहिल नज़र आता है ॥

Tuesday, October 19, 2010

कोई भी नहीं जानता किस मिटटी का है वो ।

इतना मगर पता है कि अपनी भी खुशबू नहीं मिलती ॥

Monday, October 18, 2010

सिंघां देस विदेस सम , सिंघां किशा वतन्न ।

सिंह जिका वन संचरे , सो सिंघां रा बन्न ॥

एक पूरा जीवन घूमता
आँखों के समक्ष
वो जिसे कहते थे मैं

दिन प्रतिदिन
उसी के सामने बिखरते
व्यक्तित्व के भग्नावशेष

श्वास प्रश्वास से
निखरता चैतन्य
जागरण की प्रत्येक घडी
एक नयी मृत्यु !

Wednesday, October 13, 2010

आठ पहर चौबीस घडी , घुडले ऊपर वास।
सैल अणि सूं सेकतो , बाटी दुर्गादास ॥

Tuesday, October 12, 2010

सूखे दुखे समेकृत्वा, लाभालाभो जया जयो !
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापं वाप्स्यामी ॥
सुख दुःख, लाभ हानि , जय पराजय को सामान समझ कर...युद्ध के लिए तैयार हो अर्जुन ! इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा !

Friday, October 8, 2010

माई ऐड़ा पूत जन , jएडा दुर्गादास , बाँध मुंडासे राखियो, बिन थांबे आकाश !

Thursday, October 7, 2010

अजीब शहर है ये , अजब बस्ती , लोग अपना पता भी दूसरों से पूछते हैं ॥
माँ बाप अजनबी हैं , बेटे बेटी पराये, अहम् के चश्मे चढ़ा ममत्व ढूंढते हैं ॥
बेहेन भाई सशंकित, हुए रिश्ते कलंकित, दोस्ती में भी सब स्वार्थ तोलते हैं॥
ये बेदर्द हाकिम,हर चाल इनकी ज़ालिम,हम इनके सहारे सफीने खोलते हैं ?
ये अधकचरे ग्यानी, ये खोई सी वाणी, हम इनके भरोसे आत्मा छोड़ते हैं ?
भेड़ों की टोली से काट खुद को 'ओमी', सिंहों के शावक तो अकेले डोलते हैं ॥

Monday, October 4, 2010

कृष्ण जैसे व्यक्ति अपार करुणा के कारण अर्जुन के अँधेरे में भी उतरते हैं !अर्जुन का तो सामर्थ्य है नहीं कि कृष्ण की ऊंचाइयों को छू सके... कृष्ण को ही अपने व्यक्तित्व को इस प्रकार ढालना पड़ता है कि अर्जुन को भगवद्गीता समझ में आ सके !

Saturday, October 2, 2010

सर पर ढेरों धूल जमी है .भागो ! टखने टखने आग बिछी है , भागो !


बंद है कारोबार, दुकानें खाली ! और सड़कों पर भीड़ लगी है , भागो !


मंजिल है दो चार कदम की दूरी पर ! और आगे दीवाल खड़ी है ,भागो !


धरती का दिल काँप रहा है शायद, घर घर हाहाकार मची है ,भागो !

Thursday, September 30, 2010

चलो अब किसी और के सहार लोगों , बड़े खुदगर्ज़ हो गए हैं किनारे लोगों !
सहारा समझ के खड़े हो साए में जिनके , ढह पड़ेंगी अचानक ये दीवारें लोगों !
क्या गुजरेगी सफीने पे खबर नहीं ,अंधड़ से मिल गयीं हैं पतवारें लोगों !
हज़ारों बेबस आहें दफ़न हैं यहाँ , मेहेज़ पत्थरों के ढेर नहीं ये मजारें लोगों !

Saturday, September 25, 2010

मन के अनुसंधान समझ, शंब्दों के परिधान पहन ...ये कौन आह जगी ?
शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ....ये कौन आह जगी ?
बोध के वर्तुल से मुक्त, मात्र चैतन्य से युक्त, जलाती उष्णता में हल्की बयार सी.... ये कौन आह जगी ?
स्वत्व को विस्तीर्ण करती, अहम् जीर्ण जीर्ण करती, माँ की फटकार सी ....ये कौन आह जगी ?
स्थित अपनी नग्नता में, निश्चिन्त अपनी मग्नता में , शिशु की किलकार सी...ये कौन आह जगी ?

Friday, September 24, 2010

जो रो ना सके वो जवानी क्या ! जो हंस ना सके वो बुढापा क्या !

जो चल ना सके वो हौसला क्या ! जो मिट ही जाये वो फासला क्या !

जो जला ना दे वो आशिकी क्या ! जो मिटा ना दे वो बंदगी क्या !

होश वो सम्हालें जिन्हें फुर्सत , जो लुटा ना दे वो बेखुदी क्या !

जिसे जिया ना जाये वो क़ज़ा क्या ! जो मरना ना सिखाये वो ज़िन्दगी क्या !

बौनों की बस्ती पे क्या पीठ ठोकें ! जो फ़रिश्ता ना बने वो आदमी क्या !

ये कैसी बेखुदी है लिख गया हूँ मैं अपने बदले तेरा नाम !
पापा , होश में मरना है , ताकि अगला जन्म आप स्वेच्छा से ले सकें ... होश में प्राण त्यागने हैं ... पापा की पलकें बंद थीं ... वोह बस गर्दन से हाँ का इशारा करते रहते थे ...कठिन काम था ... रुंधे गले से अपने पिता को मरने की सलाह देना ... पर मैंने ७ दिन तक ये प्रयोग किया... मुझे नहीं पता पापा ने होश में देहत्याग किया या नहीं ... पर यदि मृत्यु के पार भी जीवन है तो कदाचित यह प्रयोग पापा के काम आया हो !
तुम और मैं एक ही सत !
एक अस्तित्व ,
मेरा सर्वस्व मुझे ही समर्पित !

Thursday, September 23, 2010

अंत में तोः खुदा और भगवान् एक ही सत्ता का नाम है ... पर हम अभी अंत में पोहोंचे नहीं है ! जहां हम खड़े हैं वहाँ चाहे मार्ग का ही सही, पर भेद है.... सभी मार्ग सुन्दर हैं... शुभ हैं... तुम्हें तुम्हारा मार्ग मुबारक... मुझे मेरा... जब मंजिल पे मिलेंगे तब देखी जाएगी... यह संसार सुन्दर ही इसलिए है कि यहाँ अलग अलग किस्म के फूल खिले हैं... हिन्दू अपनी खुशबू बिखेरे, इस्लाम अपनी, इसाईयत अपनी..... तुम्हारी भी जय जय , हमारी भी जय जय ! पर जब तक हम इस भेद की दुनिया में जी रहे हैं ... एक दुसरे का सम्मान ही खुशहाली का मार्ग है ! कोई किसी को नीचा ना दिखाए.... वरना हम यहीं लड़ मर के नष्ट हो जायेंगे ! ना खुदा ही मिला , ना विसाले सनम ! ना इधर के रहे ना उधर के रहे !
सारी बात की कुंजी इसी अनुभव में छुपी है कि हम अपने आस पास की घटनाओं से क्या सीखते हैं ! जीवन और मृत्यु दोनों ही हमारे बस के परे हैं ... पर हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में है ... सच पूछें तो केवल दृष्टिकोण ही हमारे हाथों में है ... घटनाएं तो स्वतः घटती हैं... हम बेबस हैं ... अब सवाल ये है कि हम क्या करें ? या तो इस बेबसी का रोना रोयें या अपना नजरिया ही सम्हाल लें । पापा ने अपने जीवन और मृत्यु दोनों में मुझे बोहोत कुछ सिखाया ... इसलिए , मैंने सोचा...ऐसे मीठे व्यक्ति की मृत्यु को रोने धोने का उपक्रम नहीं बनाना है .. प्रेम से जीया हूँ,,, प्रेम से ही उन्हें विदा भी करूँगा.... बस तभी यह पंक्तियाँ मुझ पे उतर आयीं ..... मृत्यु इतनी भयावह नहीं है जितनी हम उसे समझे बैठे हैं... ये पंक्तियाँ मैंने कविता के लिए नहीं लिखी हैं ... वाकई मुझ पे बीती है... पहले, पापा को खोने का भय... फिर, एक क्षण के ठहराव और मैंने मृत्यु का थोडा गहरा निरीक्षण किया... और अंत में, जब बात समझ में आई तो भय गया और मन निर्भार हो गया ! .....शुभमस्तु !

Wednesday, September 22, 2010

पञ्च भूतों से गढ़ा यह शरीर अपने कर्मों से निवृत्त हो कर पञ्च भूतों में ही लीन होना है, असल बात चैतन्य की है... हम उसकी यात्रा में सहभागी होते हैं या उसके मार्ग का रोड़ा बनते हैं !
ध्यायतो विषयान्पुंसः संग्शूप्जायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोभिजायते ॥
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है । और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध आता है ।
क्रोधाद्भावती सम्मोहः सम्मोहात्स्म्रितिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात प्रनश्यती
क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है, मूढ्भाव से स्मृति भ्रम में पड़ जाती है, स्मृति के भ्रमित होने बुद्धि का नाश होता है , और बुद्धि का नाश होने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है ।

Thursday, September 16, 2010

ईंट को बंधन, चेरी को नन्दन, नीम को चन्दन, वाम को घूंसा !
मेहता की आन, ढफाली की तान, ठठेरी को चौसा !
रंक की खीज, मूंजी की रीझ, कपूत को रोसा !
राजा को दूसरो, छयाली को तीसरो, इरंड को मूसल , खासम खूसा !

Wednesday, September 15, 2010

फिज़ा की बात सुनाएं , जज़ा की बात करें ,

खुदा मिला हो जिन्हें, वोह खुदा की बात करें !

Tuesday, September 14, 2010

मन का चीर हरण ही तो सच्चा चीर हरण है... आहा! कैसा आनंद दादा! बुद्ध पुरुष यदि चीर हरें तो फिर कहना ही क्या !
हम में और बुद्ध पुरुषों में केवल एक फर्क है । हम आँख बंद किये बैठे हैं... उन्होंने आँख खोल ली है !
क्षण भंगुरता अस्तित्व का स्वभाव है !

Friday, September 3, 2010

खेल की तरह जीवन जीना हिन्दू विचारधारा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खोजों में से एक है । खेल में एक हल्कापन होता है, खेलना एक निर्भार स्थिति है... पर मनुष्यता इतनी उलटी हो गयी है कि हम तो खेल को भी एक गंभीर विषय बना लिए हैं... खेल का जीवन में एक आध्यात्मिक उपयोग है... जिस तरह खेल खेलते हुए हम जानते हैं कि खेल पूरा हो जाने पे कोई दोस्त दुश्मन नहीं होगा... ऐसा ही तो हमारा जीवन भी होना चाहिए... ज़र, ज़मीन और जोरू के लिए आदमी कितनी मार काट करता है ! अगर ये सब एक खेल की तरह खेला जाये तो कौन पागल इन मरी हुई चीज़ों के लिए लडेगा ? इसीलिए तो कृष्ण के जीवन को हमने लीला कहा है... इसीलिए तो कृष्ण घोर संकट की स्थिति में भी हम पे हँसते ही नज़र आते हैं....
रोते , शिकायत भरे चित्त से परमात्मा का खुला द्वार भी बंद हो जायेगा ... परम के द्वार तो उसी के लिए खुले हैं जो हँसता ,गाता, नाचता वहाँ जायेगा !

Thursday, September 2, 2010

तुभ्यं वस्तु गोविन्दम । तुभ्यं समर्पये ! तेरा तुझको अर्पण ,क्या लागे मेरा ! जिस अज्ञात से चैतन्य की यात्रा आरम्भ होती है...और जहां हमें लीन हो जाना है ...उसकी ज़रा सी पहचान हो जाये ..बस पर्याप्त है ! ....फिर कैसा भय ? कैसी चिंता ?

Wednesday, September 1, 2010

सत्य बोला नहीं , कि झूठ हो जाता है !

Tuesday, August 31, 2010

मौन ही सघन होते होते परमात्मा बन जाता है !

Thursday, August 26, 2010

गधा ! ग = गंभीर , धा = धार्मिक । जो धर्म को अति गंभीरता से ले वो गधा ! कृष्ण नाचते, गाते, हँसते धर्म के पहले प्रणेता हैं ! Guru Gorakhnath has summed up the essence of religion like this --- हंसीबा , खेलीबा, धरीबा ध्यानम ! हंसो, खेलो, और ध्यान करो ! laugh, play and meditate ! As simple as that !

Sunday, August 22, 2010

काम के विरोध में राम नहीं मिलेंगे ... काम के पार राम मिलेंगे !

Friday, August 20, 2010

राम नाम की लूट है, लूटि सके तो लूट ! जिस धरा से भी जल बहे , हम तो नहा लेंगे मधुरिका !
मीरा ने गाया है ... आये मोरे सजना ,फिर गए अंगना , मैं रही अभागिन सोय री ... मैं जान्यो नाहिं हरि सों मिलन कैसे होय री... संतों ने तो स्पष्ट राह दिखाई है ... हम ही आंखें बंद करे पागलों की दौड़ मैं भागे जा रहे हैं !
परमात्मा तो अभी और यहीं है ... बस हम ही नहीं हैं ! कृष्ण के जीवन की ये पहली सीख हमें कृष्ण चेतना को समझने में बोहोत दूर तक जाएगी !
मेरो कछु ना बिगरैगो मोहन, लाज तिहारी जाएगी !

Wednesday, August 18, 2010

परमात्मा को हम खोजेंगे कैसे ? प्रत्येक खोज सिर्फ हमारे अहंकार को और मजबूत कर जाएगी । हमारा उस से परिचय क्या है ? वोह हमारे सामने भी आ जायेगा तो हमें प्रतिभिग्या कैसे होगी ? नहीं, परमात्मा ही हमें खोजेगा रिपु, हम तो केवल प्रतीक्षा कर सकते हैं, केवल तय्यारी कर सकते हैं उस महा प्रसाद की ! ये छोटी सी बात अगर हमें समझ में आ जाये तो पृथ्वी सही अर्थों में धार्मिक हो जाये !

Tuesday, August 17, 2010

चालबाजी नहीं समर्पण !
आस्तिकों की इस दुनिया में इतना पाप ? इतना व्यभिचार ? इतनी घृणा ? इतना वैमनस्य ? नहीं , हमसे कोई बोहोत मौलिक भूल हो रही है.... मेरे देखे वह भूल यही है, कि हम कृष्ण को पूजते तो हैं, पर जीने की हिम्मत नहीं है....जब तक हम इस पाखण्ड से नहीं छूट जाते, सम्यक मनुष्यता का विकास सम्भव नहीं !

Monday, August 16, 2010

कृष्ण करें तो लीला ,हम करें तो पाप !

Sunday, August 15, 2010

चरैवेति !चरैवेति !

Wednesday, August 11, 2010

यूँ पुकारे हैं मुझे, कूचा -ए-जानां वाले,

इधर आ बे, अबे ओ चाक गिरेबां वाले !

Friday, August 6, 2010

नैतिकता या आध्यात्म ?

Wednesday, August 4, 2010

परमात्मा कहीं बैठ के रो नहीं रहा, वोह सृजन के नृत्य में मगन है। परमात्मा को तो कोई अनुभव शेष नहीं, पर फिर भी वो परम आनंद में है , और हमसे परम राग में वह हमें बनाता ही चला जाता है। बस यही हमारी भी दशा हो सकती है।

Tuesday, August 3, 2010

आदरणीय राजेंद्र जी,

छोट मुंह बड़ी बात होगी सर ! मेरी दृष्टि ये है कि आवाज़ देने वाला और सुनने वाला तो एक ही है, पर काव्य को जन्माने के लिए थोड़ी साहित्यिक उत्श्रन्ख्लता की अनुमति भी होनी चाहिए। दूसरे, चाहे आत्मा सुनने वाली हो या मन, या चैतन्य या प्राण ... सब शब्दों का ही भेद है। अनुभव तो अभी कोई है नहीं ! जीवन दुःख सुख की धुप छाँव में ही बीतता जाता है। मैं अपना ठीकरा आत्मा के सर फोड़ भी दूं तो क्या ? तथ्य ये है कि कष्ट तो मैं ही पा रहा हूँ।

मेरे तल पे ये कहना कि मैं सत्य जान गया हूँ , अहंकार की घोषणा होगी। इतना ही समझ में आया है कि कोई अन्दर है जो पंख फैला कर उड़ने को तत्पर है , कोई अनंत की पुकार मेरे अस्तित्व को झंकृत कर जाती है। आप सही कहते हैं...... कहने की आवश्यकता क्या है ! बस यूँ समझ लें ऊर्जा का अतिरेक है, अपना आनंद है, इसलिए बात निकलती चली जाती है... स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।

प्रेम,

ओमेन्द्र

ओमेन्द्र

Monday, August 2, 2010

अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ !

महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़ !

रूप ,गंध,स्पर्श ,शब्द से विरस हो कर , अरूप, निशब्द, अस्पर्शित,निर्धूम से नाता जोड़ !

वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ? अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़ !

कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती , प्रेम और करुणा पे चढ़ के साक्षी का रस निचोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी ! महाशून्य के साथ सगाई तेरी रची गयी !

Sunday, August 1, 2010

एको विशुद्ध बोधोहमिति निश्चय्वान्हिना ।
प्रज्वाल्या ज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥
मैं एक अति शुद्ध बुद्ध रूप हूँ। ऐसे निश्चय रुपी अग्नि से अज्ञानरूपी वन को जला कर शोक रहित हुआ ,तू सुखी हो !

Saturday, July 31, 2010

जैसे गुरु नानक कहते हैं ..जहां मिले पीव से प्यारी, वहाँ कौन पुरुष कौन नारी ? ना प्रेमी बचा ना प्रेमिका...बचा केवल शुद्ध प्रेम !

Thursday, July 29, 2010

नहि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविश्यन्ति मुखे मृगः ॥
जब मैं था तब हरि नहीं ,अब हरि है मैं नाहीं।
सब अँधियारा मिट गया ,जब दीपक देखा माहीं ॥

Sunday, July 25, 2010

मोक्ष का अर्थ मेरी मुक्ति नहीं, बल्कि ' मैं' से मुक्ति है !

प्रीत पुराणी ना पड़े ,जो सज्जन सू लग्ग।

क्रोंर बरस जल में रहे तोई पथरी तजे ना अग्ग॥

मिलनों भलो ना बिछरनो तज दोंयाँरो संग।

बिछरता मछली मरी, मिलता मरयो पतंग ॥

Friday, July 23, 2010

हानि लाभ, जीवन मरण ,यश अपयश विधि हाथ ॥

Wednesday, July 21, 2010

लालायित अधरों से जिसने हाय नहीं चूमी हाला, हर्षित कम्पित कर से जिसने हा ना छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी का पास नहीं जिसने खींचा, व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला॥

Monday, July 19, 2010

प्रेम इतनी सशक्त घटना है कि उसका भ्रम भी उपयोगी हो सकता है, संसार इतनी निरर्थक घटना है कि उसका सत्य होना भी निरर्थक है।
हंसीबा खेलीबा धरीबा ध्यानम ! हंसो, खेलो और ध्यान करो !

Sunday, July 18, 2010

हम जिसे छू ना सकें उसको खुदा कहते हैं !
हम जिसे छू ना सकें उसको खुदा कहते हैं !
कहाँ मेरा शौक-ए-नज्ज़ारा , कहाँ ये देहर कौना ,
कोई दुनिया नई होती, कोई आलम नया होता !

Saturday, July 17, 2010

यह जीवन एक लीला है लाला ! अस्तित्व का खेल ! काहे को इतना सर पटक रहे हो ? मजे करो और बेचारे परमात्मा को भी मजे करने दो ! क्यूँ नाहक परेशान हो रहे हो?
पानी में मीन पियासी , मोहे सुन सुन आवे हांसी रे.....शुभमस्तु !
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथाः । किसी को राजी करने के लिए नहीं, किसी प्रयोजन से नहीं ! केवल , और केवल अपने आनंद के लिए मैंने प्रभु राम की गाथा गयी है।
रहिमन याचकता गहें , बड़े छोट व्हे जात।
नारायण हूँ को भयो, बावन आंगुर गात॥

Friday, July 16, 2010

हम जानते क्या हैं अस्तित्व के प्रयोजन के बारे में कि हम परमात्मा से मांगने बैठ जाते हैं ? जिस अस्तित्व से जीवन पाया है, चैतन्य मिला है, सोच मिली है, समझ मिली है, उस से और की मांग करना हद दर्जे की कृतघ्नता है।

Thursday, July 15, 2010

निःशब्द के अनुभव को शब्द देने का प्रयत्न ,अपने आप में ही भागीरथ प्रयास है। उस पे इतनी सशक्त कविता ! आप भाग्यशाली हैं दादा कि अस्तित्व अपने पूरे वेग से आप पर उतर रहा है। हमारा सौभाग्य है कि इस अवतरण के हम भी साक्षी हैं !

Friday, July 9, 2010

तत त्वम् असि श्वेतकेतु !
कहाँ हम कहाँ वो, कहाँ बेहिजाबी, कहाँ राज़दारी , येह हुस्न-ओ-मोहोब्बत ,
कहाँ अपनी नज़रें , कहाँ उनके जलवे , यह उनकी इनायत नहीं है तो क्या है ?
सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं यह खुमारी क्या करें,
मेरे वजूद में घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तनहाइयों में, तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से फर्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनूं में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है !

Thursday, July 8, 2010

ज़ख्म को फूल, सर-सर को सबा कहते हैं ,

जाने क्या लोग हैं, क्या दौर है, क्या कहते हैं !

Tuesday, July 6, 2010

अश्रद्धा में लाभ हो जाये तो भी दो कौड़ी का है, क्यूंकि अश्रद्धा हमें कृपण बना कर जाएगी। श्रद्धा में हानि भी हो जाये तो हानि नहीं है, क्यूंकि हमने श्रद्धा की, तो हम रूपांतरित हो जायेंगे। कबीर तो कहते ही हैं ... सहज मिले अविनाशी ... पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवे हांसी।
The happiness of a man is "I will". The happiness of a woman is , "He will'.
आम आदमी को सत्य समझ में नहीं आता, स्वार्थ समझ में आता है।

Friday, July 2, 2010

आसमां की खिड़की में एक चेहरा देखता हूँ ,
हर अंगो-अक्स तेरा नूर में घुलते देखता हूँ ,
गिर चुका है धूल में हर मुखौटा मेरा ,
हर आईने में तेरा ही नूर सुनहरा देखता हूँ ।

Wednesday, June 30, 2010

मस्जिद तो बना दी इक शब में, इमां की हरारत वालों ने,
पर मन ये पुराना पापी था बरसों में नमाज़ी हो ना सका।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मत्रिप्ताश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं ना विद्यते ॥
जो मुष्य आत्मा में रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा संतुष्ट हो , उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाक्रितेनेंह कशचानाह ।
ना चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदार्थ्व्यपाश्राया ॥
उस महापुरुष को ना तो कर्म से कोई प्रयोजन रहता है, और ना कर्मों के ना करने से,तथा संपूर्ण प्राणियों में भी, इसका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
श्रीमद्भगवद्गीता , तृतीय अध्याय। श्लोक १७ व १८.

Tuesday, June 29, 2010

मय्यिअनन्त महाम्बोधो विश्वपोत इतस्तः ।
भ्रमति स्वान्त्वातैन न ममास्त्य सहिष्णुता ॥
मुझ अनंत महासागर में विश्व रुपी नौका , मन रुपी पवन के ज़ोर से इधर उधर डोलती है, परन्तु , इससे मुझको असहिष्णुता नहीं है। यूँ कहें दादा , प्रकृति के गुणों से संचालित यह संसार अपनी ही गति से इधर उधर डोलता है। मुझ चैतन्य के महासागर को उस से क्या लेना देना !

Monday, June 28, 2010

पञ्च भूतों का शरीर आज नहीं कल पञ्च भूतों में ही लीन होगा , पर यदि हमारे सदगुरुओं के वचनों को प्रामाणिक माना जाये तो चैतन्य अपनी अमर यात्रा पर ही रहता है।

Sunday, June 27, 2010

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहम बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किन्चिनमा गृहाण विमुंच माँ ॥
जब मैं हूँ तब बन्ध है, जब मैं नहीं हूँ मोक्ष है , इसी प्रकार मान कर ,इच्छा कर, ना तो ग्रहण कर और ना त्याग कर ! - अष्टावक्र के वचन जनक को।

Saturday, June 19, 2010

रस्मो-रिवाज वो निभाएं जिन्हें गरज हो दुनिया वालों से,
ना रुसवाई का कोई डर था ना था खौफ पशेमान होने से ,
खुद को मिटाने की कसम पे चले हैं वफ़ा के दीवाने ,
आजमाना हो खुद को तो खोलते हैं हम सफीना , या फिर,
बस दामन बचा के निकल जा जुनूं के सैलाब वालों से।

हंसा विरद सम्हाल ले, चुगे तो मोती चुग्ग , नितर करना लंघना , जीणों कितेक जुग्ग ।

हे हंसा, अपने स्वरुप को सम्हाल, भूख लगने पर केवल मोती चुनना , नहीं तो भूखे मरना अच्छा, अंततः तू कोई युगों तक तो जीने आया नहीं।

Wednesday, June 16, 2010

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा, मैं तो दरिया हूँ समंदर में उतर जाऊंगा।

तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊंगा,घर में घिर जाऊंगा सेहरा में बिखर जाऊंगा।

अब तेरे शहर में आऊँगा मुसाफिर की तरह, साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊंगा।

ज़िन्दगी शमा की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम', बुझ जाऊंगा मगर सेहर तो कर जाऊंगा।

Saturday, June 12, 2010

आसमां आज भी नालों से हिला सकता हूँ,

मैं जो खामोश हूँ , इसका भी सबब है कोई !

Sunday, May 30, 2010

नयन जो सतत ढाढस बंधाते मुस्कुराते थे, वे तीक्ष्ण चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया।

Saturday, May 29, 2010

फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा, बिखरते बादल इकठ्ठा देख , ठिठक गया।
विछोह के भय में भावों का अतिरेक , धूप छाया का ये निर्मम खेल देख , ठिठक गया ।
घोर पीड़ा में भी आयोजन यूँ साहस का, चैतन्य के अनुपम स्वरों को सुन , ठिठक गया।
मृत्यु के सामीप्य में कुछ घट गया, शाश्वत जीवन की झलक पा, अहो ! मैं निखर गया !

आकाश्वदंतोहम घटावात्प्रक्रितम जगत ।

इति ज्ञानम् तथैतस्यम ना त्यागो, ना ग्रहो लयः ।

मैं आकाशवत अनंत हूँ, संसार घड़े के सामान प्रकृति जनित है। इस कारण, इसका ना त्याग है, ना ग्रहण है, ना लय है। ऐसा ज्ञान है।

Tuesday, May 25, 2010

पिता के कांपते हाथ देख के सिहर गया , वोह ममता की ठांव बिखरते देख सिहर गया ।


जिन कन्धों पे चढ़ के जीवन देखा था, उन कन्धों को ढीलकते देख सिहर गया !


उर विशाल , धीर चित्त, निश्चल ह्रदय, धोंकनी सा सीना चलता देख सिहर गया !


नयन जो सतत ढाढस मुस्कुराताथे, वे चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया !


फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा,









Monday, May 24, 2010

दैर- ओ -हरम भी मंजिल-ए-जानां में आये थे, शुक्र है बढ़ गए अपना दामन बचा के हम !

मन्दिर और मस्जिद भी परमात्मा की खोज के रास्ते में आये थे। पर धन्यवाद हे प्रभु ! उन सब के पागलपन से बच के हम आगे निकल गए !

Sunday, May 23, 2010

अम्बा किम गोत्रोहम अस्मि ? मेरा गोत्र क्या है माँ ?

Saturday, May 22, 2010

आम आदमी को सत्य समझ में नहीं आता, स्वार्थ समझ में आता है।

Friday, May 21, 2010

(कु) जाति प्रथा ! एक कदम अन्धकार

छान्दोग्योपनिषद में एक सत्यकाम नाम के बालक की कथा का उल्लेख मिलता है।


नन्हे सत्यकाम को संन्यास की तीव्र इच्छा हुई। जब वह बालक अपने आचार्य के पास ब्रहचर्य की शिक्षा लेने गया तो आचार्य ने उस से उसका गोत्र पुछा । नन्हे बालक ने आ कर अपनी माँ से पूछा -"अम्बा, किम गोत्रोहम अस्मि ? ब्रह्मचर्यं भवतु विविद्याम। " अर्थात, माँ, मेरा गोत्र क्या है ? उसकी माँ एक दासी थी । उसने उत्तर दिया , मैं नहीं जानती पुत्र तेरा गोत्र क्या है? अपने आचार्य से कहना, तेरा नाम सत्यकाम है और तेरी माँ का नाम जाबाला है। बालक आचार्य के पास यही उत्तर ले केर गया। उसकी सत्यनिष्ठा तथा सरलता से प्रभावित हो आचार्य ने उसे शिष्य स्वीकार किया।



५००० साल पहले की भारतीय संस्कृति ने सामाजिक सहजता के वोह शिखर छुए थे, जिनसे ki





हंसा विरद सम्हाल ले, चुगे तो मोती चुग्ग,
नितर करना लंघना,जीणों कितेक जुग्ग ।
दश्त-ए-तन्हाई-ए-सेहरा में खड़ा सोचता हूँ,
हाय, क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले ।

Thursday, May 20, 2010

हंसीबा, खेलीबा, धरीबा ध्यानम । हंसो , खेलो, और ध्यान करो !
आदमी का हयात कुछ भी नहीं, बात ये है कि बात कुछ भी नहीं,
तूने सब कुछ दिया है इन्सां को, फिर भी इन्सां की ज़ात कुछ भी नहीं,
हुस्न की कायनात सब कुछ है, इश्क की कायनात कुछ भी नहीं,
आदमी पैरहम बदलता है, ये हयात-ओ मयात कुछ भी नहीं।
हयात= जीवन , कायनात= अस्तित्व, पैरहम= कपडे , मयात=मृत्यु ।

Tuesday, May 18, 2010

या रब, किसी के राज़-ए-मोहोब्बत की खैर हो ,

दस्त-ए-जुनूं रहे ना रहे, आस्तीन रहे।

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, ना होता मैं तो क्या होता !

Monday, May 17, 2010

महाभारत से एक बोध कथा। एक पंडित और उसका मित्र एक साधु से मिलने गए। पंडित अपने ज्ञान के अहंकार से भरा था । उसने साधु को प्रणाम किया और पूछा , ' महाराज , मुझे मोक्ष कब मिलेगा ? " साधु बोले- ३ जन्मों के बाद। पंडित उदास हो गया । पंडित के मित्र ने भी डरते डरते पूछा- और महाराज मुझे? साधु एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ थे। साधु बोले- जितने पत्ते इस पीपल की शाखाओं पे लगे हैं ,उतने जन्मों के बाद। वह व्यक्ति नाचने लगा । पंडित और साधु ने उस से पूछा, तुम निराश नहीं हो? अभी तुम्हारा मोक्ष कितना दूर है ! उस व्यक्ति ने कहा, मैं आनंदित हूँ कि मुझे मोक्ष मिलेगा। मेरी पात्रता कहाँ थी , यह तो परमात्मा की असीम अनुकम्पा है कि बस इतने से जन्मों के बाद मुझ जैसे को भी मोक्ष मिलेगा। उसी क्षण आकाशवाणी हुई - वत्स, तुझे इसी क्षण मोक्ष मिलता है। तू आज से , अब से मुक्त है।
अज्ञानी तो अंधकार में भटकता ही है, ग्यानी महान्धकार में भटक जाता है --उपनिषदों से।

दर्द इतना था कि ज़ख्मों से गवाही ना हुई,

तेरे आने पे दिल की रुसवाई ना हुई ।

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़साने,
ये और बात है दुनिया नज़र ना पहचाने,
किस से कहिये दर्द की लज्ज़त यहाँ कौन जाने ,
अफ़सोस !खोजते हैं सब सतह पे ज़िन्दगी के माने।
सुनी दसकंधर वचन तब, कुम्भ्करन बिलखान , जगदम्बा हरी आनी शठ, अब चाहत कल्यान।

Sunday, May 16, 2010

वचन कर्म मन कपट तजि ,भजेहु राम रघुबीर।
जाहू ना निज पर सूझ मोहि, भयहूँ काल बस बीर॥

Saturday, May 15, 2010

अहिंसा परमो धर्मः ,हिंसा आपद धर्मः ।

Friday, May 14, 2010

सीतहि सभय देखी रघुराई ! कहा अनुज सन सयन बुझाई॥

Monday, May 10, 2010

जो ढोवत अस भार, सो किमी झोंकत भार अस,
रहिमन उतरे पार, भार झोंकी सब भार में !

Sunday, May 9, 2010

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं,

रहिमन दाहे प्रेम के , बुझि बुझि के सुलगाहिं ।
कहो रहीम कहाँ सीखी ,ऐसी उलटी बैन,
ज्यूँ ज्यूँ कर ऊंचे करो, त्यूँ त्यूँ नीचे नैन।

देनहार कोई ओर है देत रहत दिन रैन ,
लोग भरम मोपे करें ,ताते नीचे नैन।

Saturday, May 8, 2010

जोड़ ले हाथों से हाथ एक दूजे से कस कर , के यारों की महफ़िल यूँ फिर ना सजेगी ,
पी ले जी भर के नूर छलकती आंख का भी , के यौवन की मधुशाला फिर ना जगेगी,
तू दुनिया के नगमों को सुन कान रख के, फिर सुनना भी चाहे ये कुछ ना कहेगी,
है वो खुश नसीब आँख उठी जिसकी ऊपर, ये चांदी की खन खन तो यूँ ही बजेगी,
वक़्त है जोड़ ले आलम -ए-रंग से हस्ती, ये दुनिया तो गाफिल थी गाफिल रहेगी।

Friday, May 7, 2010

अब रहीम मुश्किल पड़ी ,गाढे दोउ काम,
सांच कहें तो जग नहीं , झूठे मिले ना राम।

Sunday, May 2, 2010

अहो निरंजनः शान्तो बोधोहम प्रक्रितेह परः । एतावंत्महम कालम मोहेनैव विदाम्बितः ।

मैं निर्दोष हूँ ? शांत हूँ? बोध रूप हूँ? प्रकृति से परे हूँ ? आश्चर्य ! मैं इतने काल अज्ञान करके निस्संदेह ठगा गया हूँ। ----अष्टावक्र महागीता में जनक के वचन अष्टावक्र को।

अक्ल की सतह से कुछ ओर गुज़र जाना था, इश्क को मंजिल-ए-परस्ती से गुज़र जाना था,

ये तो क्या कहिये चला था मैं कहाँ से हमदम, मुझको ये भी ना था मालूम किधर जाना था ।

बुद्धि जानती क्या है ? बुद्धि की पोहोंच कहाँ तक है? बस कोल्हू के बैल की तरह हमें हांके चले जाती है !

Thursday, April 29, 2010

जलाल-ए-आतिशो बरको सहाब पैदा कर, अजल भी कांप उठे वो शबाब पैदा कर।
तेरे खराम में हैं ज़लज़लों का राज़ निहां, हरेक गाम पे इक इंक़लाब पैदा कर।
बोहोत लतीफ़ हैं ऐ दोस्त तेक का बोसा,यही है जानेजां इसमें आब पैदा कर।
तेरा शबाब अमानत है सारी दुनिया की, तू खार जारे जहां में गुलाब पैदा कर।
तू इंक़लाब की आमत है इंतज़ार ना कर, जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर।
क्रान्ति आती नहीं , क्रांति में जाना पड़ता है .....

Monday, April 26, 2010

तड़पना है ना जलना है ना जल कर ख़ाक होना है, ये क्यूँ सोई हुई है फितरत-ए-परवाना बरसों से । कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे,नहीं मालूम क्यूँ खामोश है दीवाना बरसों से।

कोई सोजे तजल्ली से उसे निस्बत ना थी गोया,पड़ी है इस तरह ख़ाक इस तरह परवाना बरसों से। हसीनों पे ना रंग आया ना फूलों पर बहार आई,नहीं आया जो लब पे नगमा-ए-मस्ताना बरसों से।

जिसे लेना हो आ कर अब वो दरस-ए-जूनून ले ले, सुना है होश में है असगर -ए-दीवाना बरसों से।

Sunday, April 25, 2010

कृष्ण का व्यक्तित्व मानव जन्म का शिखरतम उद्घोष है। परमात्मा से हम दो तरह से चूक जाते हैं। या तो जीसस की तरह, जब हम उनको सूली पे लटका देते हैं, या फिर कृष्ण की तरह, जब हम उनको भगवान् बना के मंदिर में बिठा देते हैं। दोनों तरह से हमारे लिए आसानी हो गयी। पर ये दोनों ही मार्ग हमारे अन्दर बैठे भगवान् की हत्या के मार्ग हैं। असली क्रांति तो तभी घटती है जब कृष्ण को हम मानव रूप में देखें। तभी हम प्रयास करेंगे कि हमारी चेतना भी कृष्ण के शिखर को छू सके। कृष्ण की पूजा तो कृष्ण को निपटाने जैसा है । कृष्ण तो केवल मील का पत्थर हैं। वे तो हमारे साक्षी हैं, कृष्ण तो हमारी प्रेरणा मात्र हैं। अगर वे भगवान् बन सके, तो हम भी भगवान् हो सकते हैं। बस, इतना इशारा मात्र हैं ! वासुदेव सर्वमितिः ।
अच्छा ही है कि परमात्मा हमें नहीं मिलता। हम उसके लिए तैयार ही नहीं हैं। यूँ समझो , हम एक चाय की प्याली हैं, ओर उस पे केतली उड़ेल दो । क्या होगा? व्यर्थ का बिखराव ! हमारी चेतना के छोटे से दिए से परम की विराट ऊर्जा प्रगट नहीं होती , यह अच्छा ही है।हम जैसे हैं ,परम को handle ही नहीं कर सकते। जिस दिन हम बुलंद हो जायेंगे, परमात्मा हमें स्वयं से भर देगा। बुद्ध , कृष्ण , कबीर, नानक , फरीद, बुल्ले शाह, ....जाने कितने लोग हैं ....ऐसे बुलंद लोग जिनसे परमात्मा को पूछना ही पड़ा कि उनकी रजामंदी किस में है ! पर , पात्रता चाहिए ! पहले खुद की दृष्टि को निखारना होगा, तब परम से कोई बातचीत हो सकती है।

Saturday, April 24, 2010

वीर भोग्याः वसुंधरा । अर्थात इस धरती को केवल वीर जातियां ही भोगती हैं।

Wednesday, April 21, 2010

आ के देख इस ओर, बुझा चेहरा नहीं कोई,
इनके होश का राज़ है, कि ठेहरा नहीं कोई। .....असुप्ताः मुनिः।

Monday, April 19, 2010

इक निगाह करके उसने हमें मोल लिया, बिक गए 'आह' हम भी क्या सस्ते में !.............. असुप्ताः मुनिः। ;-)

Sunday, April 18, 2010

प्रेम ना बाड़ी ऊपजै, प्रेम ना हाट बिकाय।
राजा परजा जो चाहै, शीश देई ले जाय ।
माइल-ऐ -दैरो हरम , ये भी कभी सोचा तूने,
ज़िन्दगी खुद एक इबादत है अगर होश रहे।
मंदिर और मस्जिद में सर पटकने वालों, कभी सोचा है ? अगर होश से जियो तो सारा जीवन ही एक प्रार्थना है।
सारा खेल होश का है। मरते समय जो पीड़ा होती है मरने की नहीं होती बल्कि बेहोशी में व्यर्थ गंवाए जीवन की होती है। और होश की यात्रा अभी और इसी समय से शुरू की जा सकती है ....................असुप्ताः मुनिः ।

Saturday, April 17, 2010

इशारे समझ सके ये दुनिया में दम कहाँ, राज़ों को बेपर्दा करने का यहाँ पे है ख़म कहाँ ।
मेरी लहरें मेरी मस्ती है किनारा मेरा वजूद,समंदर को इन चोटों कि कोई खबर ही कहाँ !
महफ़िल में तेरी होश का कुछ दौर है साकी, तेरे जाम में सहबा नहीं कुछ और है साकी।

Thursday, April 15, 2010

पीता बगैर साकी ये कब थी मेरी मजाल, दर पर्दा चश्म-ए-यार की शेह पा के पी गया ।
असुप्ताः मुनिः । जो सोया नहीं है केवल वही मुनि है। या यूँ कहें जो जागा हुआ है केवल वही मुनि है।

Wednesday, April 14, 2010

चैतन्य का छोटा सा दिया, और अनगिनत हमले, सघन अँधेरे में मुझे अपना पता कैसे चले !

Tuesday, April 13, 2010

सौदागरी नहीं ये इबादत खुदा की है, ए बेखबर,जजा की तमन्ना भी छोड़ दे।
परमात्मा कि तलाश कोई व्यापार नहीं, बेहोशी में खोये आदमी, प्रार्थना के प्रतिकार में कुछ मिलेगा, यह आशा छोड़ दे ।

Monday, April 5, 2010

संत कवि तुलसी दास के जीवन की एक बोध कथा !
तुलसी अपनी पत्नी को अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी मायके गयी। तुलसी उनके बिना ना रह पाए। पीछे पीछे पोहोंच गए। परन्तु वे इतने कामांध थे कि रास्ते में पड़ने वाली हर बाधा को उन्होंने बिना सोचे समझे पार कर लिया। उफनती हुई यानुमा नदी को उन्होंने एक सड़ी लाश पे बैठ के पार किया। ससुराल का द्वार बंद पा कर वो पिछले दरवाज़े से घुसे। छत्त पर चढ़ने के लिए सीढ़ी ना पा केर एक सांप के सहारे वो अपनी पत्नी के कक्ष तक जा पोहोंचे। उनकी यह हालत देख कर पत्नी ने एक ताना कसा।
मरण धर्मा देह से देखी ना ऐसी प्रीत, होती जो श्री राम में होती ना तो भवभीत।
अर्थात, हड्डी मांस के इस शरीर से ऐसी ममता मैंने कभी नहीं सुनी, इतनी प्रीती अगर आपको श्रीराम से होती तो दुनिया का भय आपके ह्रदय से समाप्त हो जाता। उस दिन तुलसी ने संसार छोड़ दिया।
प्यारे मित्रों, श्री सचिन तेंदुलकर पर इतने passionate discussion में आप लोगों ने जितनी ऊर्जा लगायी है, उसका १० प्रतिशत भी आज के युवा देश की समस्याओं के लिए लगा लें तो हमारी हर समस्या सुलझ सकती है।
परमात्मा हमारे जीवन को बोधगम्य बनाये....
शिवमस्तु !
शंकर ज्ञानमार्गी व्यक्ति थे। एक व्याकरण के शिक्षक को दुक्रिन (संस्कृत भाषा का धातु) को रटते देख शंकर का ह्रदय करुणा से भर आया उन्होंने कहा, भज गोव्न्दम मूढमते, संप्राप्ते सन्निहिते काले , नहीं नहीं रक्षति दुक्रिन रटने ! गोविन्द को भज हे मूढ़ ! जब मृत्यु अपना घेरा डालेगी, व्याकरण को रटना काम ना आएगा ! ज्ञान की शुष्क धरा से प्रेम व भक्ति का ऐसा अंकुर फूटना , इस बात का प्रमाण है कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं !

Thursday, April 1, 2010

रगों में जो बहता है, वो गाढ़ा पानी है,
यूँ तो उसका होना फकत फानी है ,
गर्मी-ए-जुनूं से जब दिल जलता हैं ,
कतरा कतरा वजूद पिघलता है,
तब जा के आती है तासीर-ए-मसीहाई,
हर लफ्ज़ से होती है तामीर-ए-रुबाई,
खुद का मिटना खुदाई का दाम होता है,
दिल का नूर यूँ पेश-ए-आम होता है।

Wednesday, March 31, 2010

जल जल के भी अंधे पतंगों को ना अक्ल आई ,
आज भी शम्मा वही है, गर्मी-ए-बाज़ार वही ।

Monday, March 29, 2010

अगर उपनिषदों का ये एक मंत्र हमारी समझ में समा जाये, तो इसके आगे सारे शास्त्र, सारे पंथ, फीके हैं। यदि ये दीख जाये कि भोग और योग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तो आमूल क्रान्ति घट सकती है। फिर किसी गुरु, किसी मंदिर, किसी भगवान् कि कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।

Tuesday, March 23, 2010

आचार्यो मृत्युह !
सच्चा सदगुरु हमारी मृत्यु बन कर आएगा !

Saturday, March 20, 2010

ये है मैकदा, यहाँ रिंद हैं , यहाँ सब का साकी इमाम है,

ये हरम नहीं अरे शेख जी,यहाँ पारसाई (restraint) हराम है ,

जो ज़रा सी पी के बहक गया, उसे मैकदे से निकाल दो,

यहाँ कमनज़र का गुज़र नहीं, यहाँ अहले ज़र्फ़ का काम है,

ये जनाब-ए-शेख का फलसफा भी अजब है सारे जहां में,

जो यहाँ पिए तो हराम है, जो वहाँ पिए तो हलाल है,

इसी कायनात से ए जिगर, कोई इंक़लाब उठेगा फिर,

के बुलंद हो के भी आदमी, यहाँ ख्वाहिशों का गुलाम है।

Monday, March 15, 2010

उठाओ हाथ, जश्न मनाने का मौसम आया,

हंसो गाओ, खुद को भुलाने का मौसम आया,

चढ़ी खुमारी,जाम टकराने का मौसम आया,

मिटी हदें,मैकश-ओ-साकी बनने का मौसम आया

Sunday, March 14, 2010

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बाराह,
नफरत में जीना आसां है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्जी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !

Saturday, March 13, 2010

खुरो खस्तो रुके, रास्ता तो चले,

मैं अगर थक गया, काफिला तो चले,

चाँद सूरज बुजुर्गों के नक्श-ए-कदम, खैर जाने दो इन्हें, हवा तो चले,

हाकिम-ए-शहर यह भी कोई शहर है,मस्जिदें बंद हैं, मैकदा तो चले,

बेलचे लाओ, खोदो ज़मीन की तहें , मैं कहाँ दफ़न हूँ, कुछ पता तो चले।

.... कृष्णम शरणम गच्छामि !
ज़िन्दगी अपने दम पे जी जाती है,
औरों के दम पे तो सिर्फ जनाज़े उठा करते हैं। -भगत सिंह

Thursday, March 11, 2010

ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ है असीम विस्तार। समस्या ये है कि हमारी सीमित बुद्धि से हम असीम को समझेंगे कैसे? इसलिए ब्रह्म को समझा नहीं जाता, उसका सिर्फ अनुभव हो सकता है। सत= being, चित=conscious, आनंद= bliss । सच्चिदानंद उस ब्रह्म का स्वभाव है। सौभाग्य से ये हमारा भी स्वभाव है। इसलिए यदि हम स्वयं के अन्दर विराजमान सच्चिदानंद को अनुभव कर लें तो हमें ब्रह्म का अनुभव हो जाता है।
जैसे हम हैं वहाँ से तो ये संभव नहीं दीखता। पंडों, राजनीतिज्ञों, ओर लाला ने हमें कीडे मकोडे होने का ठीक ठीक एहसास करा दिया है। हम अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ही चुके हैं। अभी इन चालबाजियों के चलते, हम सर के बल खड़े हैं। जब हमें कबीर समझ में आने लगें, तो सीधे होने कि यात्रा शुरू हो गयी। जिस दिन हम अपने पैरों पे खड़े हुए, हम ब्रह्म से एकरूप हो जायेंगे।

Sunday, March 7, 2010

कबीरा खड़ा बज़ार में, लिए लकुटिया हाथ, जो घर बारे आपना , चले हमारे साथ।

कबीर के रूप में भारतवर्ष में एक महान प्रतिभा ने जन्म लिया था। कई बातें कबीर को भक्ति आन्दोलन में बोहोत अनूठा व अद्वितीय स्थान देती हैं। अधिकतर अवतार , या भारतीय धर्माकाश के सबसे प्रज्ज्वलित सितारे राजपुरुष थे, राजघरानों से सम्बंधित थे, या समकालीन समाज के उच्च वर्गों से आते थे।। राम, कृष्ण, बुद्ध महावीर, नागार्जुन, शंकर, मीरा , तुलसी, रामानुज, वल्लभ, आदि सभी आभिजात्य वर्ग से आते थे।

भोग विलास की प्रचुरता में यदि जीवन से ऊब ओर बिरक्ति ना हो तो वह व्यक्ति तो कोई मूढ़ ही हो सकता है, इसलिए कृष्ण ओर बुद्ध सरीखे व्यक्तियों की आध्यात्मिक खोज मूल्यवान होकर भी क्रांतिकारी नहीं है। पर दरिद्रता में भी जिसके भीतर का कमल खिला हो तो यह घटना आमूल क्रांति की हो जाती है।

कबीर के माध्यम से ही इस संभावना के द्वार खुलते हैं, कि इहलोक में धन कि प्रचुरता या सत्ता के मद से गुज़रे बिना भी जीवन की उच्चतर संभावनाओं की ओर आँख उठ सकती है। यह एक बात कबीर के असाधारण प्रतिभा व प्रज्ञा का प्रमाण देने हेतु पर्याप्त है।

दूसरी बात जो कबीर को मूल्यवान बनाती है, वो है, निर्गुण की उपासना का समाज में व्यापक प्रसार ! मीरा , सूरदास, तुलसी इत्यादि द्वारा परमात्मा के साकार रूप की उपासना के दौर में कबीर ने परम के निर्गुण रूप का सरल भाषा में प्रतिपादन किया तथा उसको अपनी वाणियों द्वारा घर घर में गूंजा दिया। मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे, में तो तेरे पास में, ऐसी सीधी चोट कबीर के ही सामर्थ्य से उपजती है ।

स्थूल रूप में परमात्मा की धारणा सरल है। केवल उपनिषदों के ऋषियों ने ही अहम् ब्रह्मास्मि का अमर उद्घोष कर निर्गुण ब्रह्म को स्थापित किया था, पर वह चैतन्य का शिखर केवल गिने चुने ब्राह्मणवादी विचारधाराओं कि गिरफ्त में ही रहा। कबीर ने न सिर्फ उस ऊंचाई को छुआ जहां सूक्ष्म निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ, बल्कि, उस निराकार परमेश्वर को लोकवाणी में बाँध कर सर्वजन के लिए उपलब्ध करा दिया। यह कोई छोटी मोती घटना नहीं थी, एक क्रांति का सूत्रपात थी। कबीर के इस साहस के चलते ही भारतवर्ष में निर्गुण संतों कि एक लम्बी श्रंखला का निर्माण हुआ, जिस में दादू, रज्जब, धर्मी दास, सहजो बाई, नानक ,पल्टू ,चरण दास, दरिया, फरीद जैसे अनेकानेक नाम आते हैं।

कबीर की तीसरी ओर सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है आध्यात्म का गृहस्थ जीवन में सहज मिश्रण ! सदियों से धर्म के अन्वेषकों के लिए संसार को छोड़ कर हिमालय की ओर प्रस्थान करना अनिवार्य माना जाता रहा है। कबीर ने प्रामाणिक रूप से ये स्थापित किया कि आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए संसार को पीठ दिखाना आवश्यक नहीं। इस संसार में रहते हुए भी जीवन के शिखर को छुआ जा सकता है। कबीर ने स्वयं विवाह किया, तथा गृहस्थ जीवन के दायित्वों को निभाते हुए आध्यात्मिक जीवन के गूढ़ रहस्यों को भी जिया। जिस तरह से रूढ़िवादी ताक़तों ने गृहस्थ जीवन को निन्दित किया था, साधारण मुनष्य के लिए परम के द्वार सर्वथा बंद कर दिए गए थे। कंचन ओर कामिनी को नरक का द्वार बता कर दकियानूसी पंडों ने धर्म के प्रगटीकरण की सब संभावनाएं ही समाप्त कर दी थी। कबीर ने अपने जीवन से ही क्रांति का आरम्भ किया। स्वयं किसी पर बोझ न रहते हुए, वे साक्षी भाव को उपलब्ध हुए। उनके आस पास रहने वालों के लिए , यह चमत्कार से कम नहीं था। इसीलिए बे पढ़े लिखे साधारण से जुलाहे का भी हज़ारों कि संख्या में शिष्यों ने अनुकरण किया। आजीविका कमाते हुए ही ,व्यक्ति ध्यान में भी जा(work meditation ) सकता है, इस युग प्रवर्तनकारी घटना के प्रणेता कबीर ही थे।

कबीर का एक ओर योगदान जो समकालीन समाज में काम में लिया जा सकता है, वह है, रूढ़ियों पर चोट, तथा सर्वथा सम्यक धर्म निरपेक्षता। सत्य का साक्षात्कार रूढ़ियों के सर्वथा विपरीत है, यह कबीर के जीवन से ही समझ में आता है। किसी कर्मकांड कि परवाह न करके, एक साधारण से जुलाहे को चादर बुनते बुनते यदि आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, तो यह बात मूल्यवान है ।

सनातन धर्म एवं इस्लाम , दोनों धर्मों की रुढियों पर कबीर ने बेहिचक चोट की है। कबीर के जीवन कि सबसे बगावती घटना उनके देह त्याग से सम्बंधित है , जिसे यहाँ उधृत करना उचित होगा। उस समय यह प्रचलित था कि काशी में मृत्यु का अर्थ सीधा वैकुण्ठ वास होगा, और एक गाँव मगहर में मरने वाला व्यक्ति निश्चित ही नरक को प्राप्त होगा। अपने अंत समय में कबीर आग्रह पूर्वक मगहर चले गए और वहीं अपनी इहलीला समाप्त की। अपने शिष्यों और प्रेमियों द्वारा विरोध पर उन्होंने एक अत्यन्य प्यारे तर्क का प्रयोग किया " काशी में मर के यदि मुक्त हुआ तो क्या मुक्त हुआ, परमात्मा कि करुणा तो तभी मानी जायेगी जब मगहर में मरूं और मुक्त हो जाऊं।" परमात्मा पर इतनी अगाध श्रद्धा और इतने प्रेम से उसे चुनौती देना, कबीर के सामर्थ्य का एक अनुपम उदाहरण है।

जैसा कि समकालीन भारतीय समाज में प्रचलित हो गया है, हम अपनी विरासत को विस्मृत करते जा रहे हैं, और इसके दुष्परिणाम हमारे सामने आने भी लगे हैं। प्रचंड भोगवाद कि संस्कृति मनुष्यता को दुःख और नफरत कि भयंकर आग में जला रही है। अपने प्रज्ञा पुरुषों को भुला कर हम अपने ही हाथों अपनी हत्या कि तय्यारी कर रहे हैं। जीवन के जिन अद्भुत रहस्यों पर से कबीर ने पर्दा उठाया है, अस्तित्व की जिन ऊंचाइयों को कबीर की प्रतिभा हमारे लिए उघाडती है, वे हमें भारतवर्ष में जन्म लेने से अनायास ही मिल गए हैं। आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम उन्हें हमारे संतों के जीवन से अवगत कराएं। कबीर जैसे महापुरुषों कि आधारशिला पर नई नस्ल उत्तुंग शिखरों का निर्माण करें ,तभी सम्यक मानवता का विकास संभव होगा।

Thursday, March 4, 2010

संतुष्टि....नहीं , चैतन्य का निखार इतनी नपुंसक घटना नहीं हो सकती। खोज समाप्त होने का अर्थ है, एक गहरी आत्मानुभूति कि जो कुछ अस्तित्व से मिला है वह पर्याप्त है। हम पोहोंच चुके हैं ! यहाँ से आगे कहीं जाने को नहीं है ! किसी भी खोज का जारी रहना, चाहे वो खोज कितनी ही सात्विक हो, अहंकार का ही निर्माण करना है। खोज पर कौन जा रहा है? ये मैं ओर मेरे की ही यात्रा है
जिस दिन ध्यान सधा , उस दिन दिख गया कि जो कुछ भी अर्थपूर्ण है, वो मेरे प्रयास से नहीं, अस्तित्व कि करुणा ओर अनुकम्पा से मिला है। कहाँ सुनन कि है नहीं देखा देखी बात ! न संतोष, न असंतोष, अब केवल विराट के समक्ष समर्पण ! सघन आनंद !

Friday, February 19, 2010

प्रेम पंथ अति कठिन है , सबसों निबहे नाहिं,
चढ्नो मोम तुरंग ज्यूँ, कड्नो पावक माहिं ।

The path of love is arduous. not everyone can endure.
mounting a horse of wax, riding it thru raging fire !
एक भी व्यक्ति मशाल जला रहा है तो भी काफी है। यहाँ तो हम सब हैं। अपने अपने घरों में, दोस्तों में, आसपास, बात करते रहेंगे , बस काम हो जायेगा ।

मुझे याद है, तुमने अपने लहू से माँ को अर्घ्य चढ़ाया था,
जानता हूँ मैं यह शबाब-ए-वतन तेरे जूनून से है।

भगत सिंह, राजगुरु ओर सुखदेव ,हम में जिंदा हैं ।

बाप बोहोत सी बातें नहीं भी जानता है, जो बेटा जान सकता है। रोज़ ज्ञान विकसित हो रहा है ,इसलिए बाप का ज्ञान तो पिछड़ता जाता है, out of date होता जाता है। तो बेटे के मन में स्वाभाविक हो सकता है कि बाप कुछ भी नहीं जानता । श्रद्धा कैसे पैदा हो?श्रद्धा किन्हीं तथ्यों पे आधारित नहीं हो सकती, श्रद्धा तो केवल इस बात पे आधारित हो सकती है कि पिता उद्गम है ,स्रोत है,जहां से में आया हूँ उस से पार जाने का कोई उपाय नहीं ! मैं कितना ही जान लूँ, मैं कितना ही बड़ा हो जाऊं , मेरा अहंकार कितना ही प्रतिष्ठित हो जाए, लेकिन फिर भी मूल ओर उद्गम के सामने मुझे नत होना ही है, क्यूंकि कोई भी अपने उद्गम से ऊपर नहीं जा सकता । कोई वृक्ष बीज से बड़ा नहीं होता, हो भी नहीं सकता। बीज में पूरा वृक्ष छुपा है। कितना ही विराट वृक्ष हो जाये, वो छोटे से बीज में छिपा है। उस से अन्यथा होने कि कोई नियति नहीं है। ओर अंतिम परिणाम जो वृक्ष का होगा वो यह कि वो उन्ही बीजों को पुनः पैदा कर जाएगा।
उद्गम से आप कभी बड़े नहीं हो सकते। मूल से विकास कभी बड़ा नहीं हो सकता। वृक्ष से बीज बड़ा नहीं, चाहे कितना ही बड़ा दिखाई पड़े। इस अस्तित्वगत घटना कि गहरी प्रतीति,माता पिता के प्रति गहरे आदर से भर सकती है, लेकिन आप इसे माता पिता कि तरह नहीं सुनना , बेटे व बेटियों कि तरह इसे सुनना। यह सुनकर माता पिता के प्रति आपके ह्रदय में श्रद्धा उठे ,इसलिए कह रहा हूँ । अपने घर मैं अपने बच्चों से श्रधा मत मांगने लग जाना, क्यूंकि तब आप बात चूक ही गए।
जिस समाज मैं भी, माता पिता के प्रति आदर कम हो जाएगा, उस समाज में इश्वर भाव खो जाता है, क्यूंकि इश्वर आदि उद्गम है। वो परम स्रोत है। अगर आप अपने बाप से आगे चले गए हैं, तीस साल में , अगर आप ओर आपके बाप के बीच तीस साल का फासला है तो, परम पिता परमेश्वर से तो आप बोहोत आगे चले गए होंगे। अरबों खरबों वर्षों का फासला हो गया है। अगर परमात्मा मिल जाये तो महा जड़ ,महा मूढ़ मालूम पड़ेगा , जब पिता ही मूढ़ मालूम पड़ता है। अगर परमात्मा से आपका मिलन हो तो वोह तो आपको मनुष्य भी मालूम नहीं पड़ेगा। पीछे की ओर, मूलकी ओर, उद्गम कि ओर, सम्मान का बोध अत्यंत विचार ओर विवेक कि निष्पत्ति है , वो प्रकृति से नहीं मिलती, विमर्श,चिंतन व ध्यान से उपलब्ध होती है। पर ध्यान रहे जो भी कहा जा रहा है, वोह आपसे बेटे -बेटियों की तरह कहा जा रहा है, माता ओर पिता कि तरह नहीं।

Wednesday, February 17, 2010

हर आन हंसी हर आन ख़ुशी हर आन अमीरी है बाबा , जब आशिक मस्त फकीर हुए तब क्या दिलगीरी है बाबा ,

हम चाकर जिसके हुस्न के हैं, वो दिलबर सबसे आला है, उसने ही हमको जी बक्शा उसने ही हमको पाला है।

क्या कहिये ओर नजीब आगे, अब कौन समझे वाला है, हर आन हंसी........

कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ जोर नहीं, कुछ दाद नहीं फ़रियाद नहीं, कुछ क़ैद नहीं कुछ बंद नहीं ,कुछ फ़िक्र नहीं, आज़ाद नहीं।

शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं, हैं जितनी बातें दुनिया की , सब भूल गए, कुछ याद नहीं।

हर आन हंसी......

है आशिक ओर माशूक जहां वहाँ शाह-ए-वजीरी है बाबा, न रोना है न धोना है, न दर्द असीरी है बाबा,

दिन रात बहारें चौलें हैं ओर ऐश-ए-सफीरी है बाबा, जो आशिक हुए सो जाने हैं ये भेद फकीरी है बाबा ।

Sunday, February 14, 2010

फूल में ऐसा खो गया मैं,

उसी का चेहरा हो गया मैं,

वो दिल कि नज़रें, वो चुप सा लहजा,

रात में शबनम पिरो गया मैं ।

मित्र परीक्षित से साभार !

Friday, February 12, 2010

सलिल कण हूँ ,कि पारावार हूँ मैं , स्वयं छाया स्वयं आधार हूँ मैं,
बंधा हूँ स्वप्न में लघु वृत्त में हूँ मैं, यूँ तो व्योम का विस्तार हूँ मैं,
समाना चाहती जो बीन उर में , विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं,
भटकता खोजता हूँ ज्योति तम में, सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं ।

अहम् ब्रह्मास्मि ।

I am the eternal Brahm.

Thursday, February 11, 2010

जीवन में प्रत्येक कड़वे मीठे अनुभव को अपने चैतन्य को निखारने हेतु प्रयोग में लिया जा सकता है। यह जगत एक विराट विश्वविद्यालय है। यदि हमारे पास दृष्टि हो तो हम सतत अपने जीवन को विकासोन्मुखी कर सकते हैं।
कष्ट जीवन का तथ्य (fact) है, दुःख हमारी व्याख्या है । बचकानी बुद्धि के कारण ही हम जीवन के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर सुख ओर दुःख बना लेते हैं। वयस्क बुद्धि जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है। बचकानी बुद्धि के कारण ही हम अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं ( blame game) , और अपने सुखों के लिए खुद की पीठ ठोकते हैं । हम ये भूल बैठे हैं कि सुख और दुःख हमारे मन के प्रक्षेपण (projections) हैं। जो आज सुख है वोह कल दुःख हो जायेगा , जो कल दुःख था वोह आज सुख है। तात्विक दृष्टि से तो सुख और दुःख केवल त्रिगुणों का बरतना है ,चेतना को तो यह गुण छूते भी नहीं हैं, परन्तु सांसारिक दृष्टि से भी यदि हम जीवन के सत्य को पहचान लें तो हमारा बोहोत सा कष्ट कम हो सकता है।

जीवन की प्रत्येक सफलता -असफलता , सम्बन्ध, प्रेम, पीड़ा , आशा और निराशा , मैत्री और शत्रुता , जैसे प्रत्येक अनुभव का प्रयोग यदि हम केवल अपने जीवन को निखारने के लिए करें तभी नए मनुष्य का विकास संभव है। लेकिन बचकानी बुद्धि से यह नहीं हो सकता , इसके लिए एक सम्यक रूप से विकसित वयस्क बुद्धि चाहिए। सतत अन्तरावलोकन (introspection) ! मैं सुख और दुःख का निर्माण कर रहा हूँ या अपनी आत्मा का विकास ! इतनी जागरूकता तो चाहिए ही ।
ठोकरें खा कर भी न सम्हले ये मुसाफिर का नसीब,
राह के पत्थर ने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया ।

Sunday, February 7, 2010

मेरे नन्हे से रिंकू ,
यदि इस गीत के मर्म की हल्की सी झलक भी तुम्हें मिली है , तो तुम भाग्यशाली हो। याद है ना , परमात्मा सृजन में बसता है । अपने आसपास बिखरे हुए परम का आनंद लो। एक ही बात स्मरण रहे, अहंकार की यात्रा पे मत निकल जाना। तुम्हें परम का स्वाद मिल रहा है, इसका मतलब यह नहीं की किसी ओर को नहीं मिल रहा है। सब की अपनी अपनी यात्रा है। सबकी ओर समझ ओर करुणा से देखना। अन्यथा परम का यह खुला दरवाजा भी तुम्हारे लिए बंद न हो जाए ! ................आनंद !

प्रेम,
मन के चौराहे पर , स्मृतियों का यातायात । साक्षी चैतन्य , देखता निर्बाध !

Friday, February 5, 2010

तारों से सोना बरसा था, चश्मों से चांदी बहती थी,
फूलों पर मोती बिखरे थे , ज़र्रों की किस्मत चमकी थी,
खुशबू के खजाने लुटते थे, और दुनिया बहकी बहकी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं अब याद नहीं,
सूरज की नर्म शिराओं पर ,कलियों के रूप निखारते हों ,
सरसों के नाज़ुक शाखों पर, सोने के फूल चमकते हों,
ऐ दोस्त तुझे................
फूलों के सागर अपने थे, शबनम की सहबा अपनी थी,
ज़र्रों के हीरे अपने थे, तारों की माला अपनी थी,
दरिया की लहरें अपनी थी, लहरों का तरन्नुम अपना था,
ज़र्रों से ले केर तारों तक यह सारी दुनिया अपनी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं, अब याद नहीं।

Tuesday, January 12, 2010

Prarthna

जिस तरह से हम परमात्मा से प्रार्थना करते हैं , वह बात मौलिक रूप से ही भ्रांत है ,क्यूंकि हम प्रार्थना का वास्तविक अर्थ ही भूल चुके हैं , हमारी प्रार्थनाएं केवल हमारी वासनाओं की पूर्ति की अभिलाषा मात्र रह गयी हैं। हमारी प्रार्थनाओं के सम्बन्ध में तीन आधारभूत गलतियाँ !
प्रथम- जब भी हम परम से कोई मांग करते हैं , तो हम दरअसल क्या कह रहे हैं? कि हम परमात्मा से ज्यादा समझदार हैं ! उसे हमारी सलाह देते हैं , की चूंकि तू नहीं जानता हमारे लिए क्या हितकर है, इसलिए हम ही तुझे बता देते हैं । यह हद दर्जे की कृतघ्नता है ।

द्वितीय - क्या हम परमात्मा की चापलूसी कर रहे हैं? उसका गुणगान सुन कर वह प्रसन्न हो कर हमारी वासनाओं की पूर्ती कर देगा ? मानो परमात्मा न हुआ , कोई मिनिस्टर हो गया ! हम तो परम के स्तर तक न उठ पाए, वरन परम को ही हमने अपने स्तर तक गिरा दिया !
तृतीय - प्रार्थना एक तरह के hypnosis का भी काम करती है । चैतन्य को उर्ध्वगामी बनाना बोहोत श्रम मांगता है , तो हम एक सुगम मार्ग बना लिए हैं। आत्मानुसंधान की झंझट कौन मोल ले ! सीधे सादे शब्द दोहराए चले जाओ, काम हो गया !

ऐसी लालची , बचकानी व नपुंसक खोज से परम चैतन्य कभी नहीं मिलने वाला ! आस्तिकों की यह दुनिया इतने भयंकर कष्ट में क्यूँ पडी है? क्यूंकि हमारी मौलिक दृष्टि भ्रांत है । प्रार्थना हमारी जागतिक इच्छाओं की पूर्ती की application नहीं हो सकती। प्रार्थना तो सिर्फ एक धन्यवाद हो सकती है , उस परम के प्रति , जिसने हमारी पात्रता न होने के उपरान्त भी हमें जीवन दिया।

नयी मनुष्यता का जन्म तभी संभव है जब हम प्रार्थना को परम से भीख मांगने का उपक्रम न मान कर, केवल अनुग्रह से भर जाएँ। जितना गहरा धन्यवाद का भाव हमारे अन्दर होगा उतना ही चैतन्य हम पर बरसेगा और हमारे व्यक्तित्व का अनुपम निखार सहजता से हो जायेगा।

इसी रफ़्तार-ए-आवारा से भटकेगा यहाँ कब तक, अमीर -ए-कारवां बन जा गुबार-ए-कारवां कब तक !

Saturday, January 2, 2010

क्षण भंगुरता अस्तित्व का स्वभाव है। जीवन प्रतिक्षण नए रूप में प्रगट होता रहता है। इसी वैविध्य के कारण जीवन इतना सुन्दर भी है। तो फिर समस्या क्या है? समस्या हमारे मन में है। हमारा मन status quo चाहता है ,और यहीं हम अपनी पीड़ा का सामान तैयार कर लेते हैं। मन यथास्थिति क्यूँ बनाये रखना चाहता है? क्यूंकि हमें लगता है कि यथास्थिति में सुरक्षा है। मनुष्य जीवन कि सबसे बड़ी भ्रांतियों में से यह एक है। यथास्थिति सिर्फ एक प्रकार कि मृत्यु है। हम बार बार उन्ही विचारों से घिरे हुए एक असत्य जीवन का निर्माण कर लेते हैं जो हमें एक भंवर के समान अपने अन्दर खींच लेता है।

यह मनुष्य जीवन के सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जिस जीवन को प्रति क्षण नई सृजनात्मकता में बिताया जा सकता था, वो जीवन मात्र मृत्यु कि एक उबाऊ प्रतीक्षा बन के रह जाता है।
तो अब की बार जब मन हमें रोके तो रुकें नहीं। अज्ञात की और छलांग लें ! अस्तित्व पे भरोसा रखें ! जिसने जीवन दिया है वही सम्हालेगा भी।