Friday, December 17, 2010
Friday, November 19, 2010
Thursday, November 18, 2010
पर इस दिवाली पे आप बार बार आये ...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने ,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने ,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना ,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना ,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आये ।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना ,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए !
Monday, November 15, 2010
Sunday, November 14, 2010
Saturday, November 13, 2010
Thursday, November 11, 2010
पर इन हाथों से ना पकड़ पाओगी उसके हाथ ।
कुनकुने विश्वास से बिगड़ी बात ना बनेगी ।
फूल सी यह ज़िन्दगी कुम्हलाई ही रहेगी ।
बदल अपनी आँख , स्वयं को रूपांतरित कर लो।
वो ही है सब ऑर, खाली झोलियाँ भर लो ।
हवा का झोंका भी फिर तुझे सम्हाल जायेगा ।
स्वर्ग कहीं और नहीं , धरती पे उतर आयेगा । ..शुभमस्तु !
Wednesday, November 10, 2010
उपजता कुछ, मैं कहता कुछ , वो सुनते कुछ ,समझते कुछ ! ताश के पत्तों का महल इक बनाना था !
लौट लौट पड़ती मेरी चिल्लाहट मेरे ही चैतन्य पर , तूफानों के साये में मोमबत्तियां जलाना था !
प्रेम था, अपनत्व भी , करुणा भी थी , ममत्व भी , शब्दों की फूटी नाव से मगर, पार इन्हें लगाना था !
कौन किसकी सुनता है यहाँ ओमी ? सबको इक कुंठित ह्रदय से अपना धुंआ छितराना था !
बढ़ के कोई भी किसी के पोंछता आंसूं नहीं, अपने दुखों के बोझ से क्या सबको यूँ मर जाना था ?
बैठ अपने साथ , थोडा सा स्वयं को आराम दे, शोर के उस पार की आवाज़ भी तो पाना था !
झाँक मेरी आँख में , मेरी गर्मी को महसूस कर, तुझमें मुझमें भी कोई अपना , कोई बेगाना था ?
Tuesday, November 9, 2010
Thursday, November 4, 2010
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधे एकाग्र्सिद्धाये ॥
विषय रुपी हाथियों से डर कर, मूढ़ पुरुष, अपनी रक्षा हेतु , चित्त की एकाग्रता व निरोधिता की सिद्धि के लिए , शीघ्रता से पहाड़ों की गुफाओं में प्रवेश कर जाते हैं ।
निर्वासनं हरिम दृष्ट्वा तूश्निम विशय्दंतिनाह ।
पलायन्ते ना शक्तास्ते ,सेवन्ते कृत चाटवः ॥
वासना रहित पुरुष रुपी सिंह को देख कर असमर्थ हुए विषय रुपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं , स्वयं में स्थित हुआ वह वासना रहित पुरुष ,इश्वर से अष्टावक्र गीता इस जगत का सेवन करता है ! ( Ashtavakra Geeta )
Wednesday, November 3, 2010
Monday, November 1, 2010
उसका होना होता है ज़ाहिर भी , दिल में जुनूं तो मगर चाहिए ॥
तारे हुस्न ज़िन्दगी सभी हैं, और क्या तुझे उसकी खबर चाहिए ॥
वो तुझमें भी है और मुझमें भी, तलाश में बस असर चाहिए ॥
कुलबुलाने से बात बनेगी नहीं , इंसानियत को एक ग़दर चाहिए ॥
वो बयान है तेरे होने ही में , ये सीधी बात समझे वो सर चाहिए ॥
Sunday, October 31, 2010
Friday, October 29, 2010
Monday, October 25, 2010
विरोधाभास ! किन्तु मृत्यु है इस तन की सर्वाधिक अन्तरंग घटना !
मरण इतना मीठा लगा , कि पुनः पुनः ले उसका चुम्बन ... मरने से पहले ही मैंने हज़ार बार मरने का स्वाद चखा !
"मरने से पहले मरो !" ... यूँ फरमा गए हजरत मोहम्मद भी !
भयभीत पंखों ने क्या सूरज को ललकारा है ?
वोह सब जो डराता था , जब प्रेममय हुआ , .... तभी मेरा पुनर्जन्म हुआ !
( महान सूफी संत राबिया से अनूदित )
Sunday, October 24, 2010
Wednesday, October 20, 2010
ये जगत एक विराट महाकाव्य है , जिसका ना ओर है ना कोई छोर , हमारी बचकानी बुद्धि से हम इसे समझ नहीं सकते ... हमें विराट को समझने के लिए, विराट ही ऊर्जा और दृष्टि चाहिए .... उसके लिए संकल्प और समर्पण ...दो पंख चाहियें ... फिर थोडा सत्संग हो जाये .... बस ! फिर द्वार खुल गए !
हम ही बाधा हैं , अल्लाह हमें अपने दीदार करवाने को हमसे भी ज्यादा बेताब है !
Tuesday, October 19, 2010
Monday, October 18, 2010
Tuesday, October 12, 2010
Thursday, October 7, 2010
माँ बाप अजनबी हैं , बेटे बेटी पराये, अहम् के चश्मे चढ़ा ममत्व ढूंढते हैं ॥
बेहेन भाई सशंकित, हुए रिश्ते कलंकित, दोस्ती में भी सब स्वार्थ तोलते हैं॥
ये बेदर्द हाकिम,हर चाल इनकी ज़ालिम,हम इनके सहारे सफीने खोलते हैं ?
ये अधकचरे ग्यानी, ये खोई सी वाणी, हम इनके भरोसे आत्मा छोड़ते हैं ?
भेड़ों की टोली से काट खुद को 'ओमी', सिंहों के शावक तो अकेले डोलते हैं ॥
Monday, October 4, 2010
Saturday, October 2, 2010
Thursday, September 30, 2010
Saturday, September 25, 2010
शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ....ये कौन आह जगी ?
बोध के वर्तुल से मुक्त, मात्र चैतन्य से युक्त, जलाती उष्णता में हल्की बयार सी.... ये कौन आह जगी ?
स्वत्व को विस्तीर्ण करती, अहम् जीर्ण जीर्ण करती, माँ की फटकार सी ....ये कौन आह जगी ?
स्थित अपनी नग्नता में, निश्चिन्त अपनी मग्नता में , शिशु की किलकार सी...ये कौन आह जगी ?
Friday, September 24, 2010
जो रो ना सके वो जवानी क्या ! जो हंस ना सके वो बुढापा क्या !
जो चल ना सके वो हौसला क्या ! जो मिट ही जाये वो फासला क्या !
जो जला ना दे वो आशिकी क्या ! जो मिटा ना दे वो बंदगी क्या !
होश वो सम्हालें जिन्हें फुर्सत , जो लुटा ना दे वो बेखुदी क्या !
जिसे जिया ना जाये वो क़ज़ा क्या ! जो मरना ना सिखाये वो ज़िन्दगी क्या !
बौनों की बस्ती पे क्या पीठ ठोकें ! जो फ़रिश्ता ना बने वो आदमी क्या !
Thursday, September 23, 2010
Wednesday, September 22, 2010
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है । और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध आता है ।
क्रोधाद्भावती सम्मोहः सम्मोहात्स्म्रितिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात प्रनश्यती ॥
क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है, मूढ्भाव से स्मृति भ्रम में पड़ जाती है, स्मृति के भ्रमित होने बुद्धि का नाश होता है , और बुद्धि का नाश होने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है ।
Thursday, September 16, 2010
Wednesday, September 15, 2010
Tuesday, September 14, 2010
Friday, September 3, 2010
रोते , शिकायत भरे चित्त से परमात्मा का खुला द्वार भी बंद हो जायेगा ... परम के द्वार तो उसी के लिए खुले हैं जो हँसता ,गाता, नाचता वहाँ जायेगा !
Thursday, September 2, 2010
Wednesday, September 1, 2010
Tuesday, August 31, 2010
Thursday, August 26, 2010
Friday, August 20, 2010
Wednesday, August 18, 2010
Tuesday, August 17, 2010
Monday, August 16, 2010
Sunday, August 15, 2010
Wednesday, August 11, 2010
Friday, August 6, 2010
Wednesday, August 4, 2010
Tuesday, August 3, 2010
आदरणीय राजेंद्र जी,
छोट मुंह बड़ी बात होगी सर ! मेरी दृष्टि ये है कि आवाज़ देने वाला और सुनने वाला तो एक ही है, पर काव्य को जन्माने के लिए थोड़ी साहित्यिक उत्श्रन्ख्लता की अनुमति भी होनी चाहिए। दूसरे, चाहे आत्मा सुनने वाली हो या मन, या चैतन्य या प्राण ... सब शब्दों का ही भेद है। अनुभव तो अभी कोई है नहीं ! जीवन दुःख सुख की धुप छाँव में ही बीतता जाता है। मैं अपना ठीकरा आत्मा के सर फोड़ भी दूं तो क्या ? तथ्य ये है कि कष्ट तो मैं ही पा रहा हूँ।
मेरे तल पे ये कहना कि मैं सत्य जान गया हूँ , अहंकार की घोषणा होगी। इतना ही समझ में आया है कि कोई अन्दर है जो पंख फैला कर उड़ने को तत्पर है , कोई अनंत की पुकार मेरे अस्तित्व को झंकृत कर जाती है। आप सही कहते हैं...... कहने की आवश्यकता क्या है ! बस यूँ समझ लें ऊर्जा का अतिरेक है, अपना आनंद है, इसलिए बात निकलती चली जाती है... स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।
प्रेम,
ओमेन्द्र
Monday, August 2, 2010
अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ !
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़ !
रूप ,गंध,स्पर्श ,शब्द से विरस हो कर , अरूप, निशब्द, अस्पर्शित,निर्धूम से नाता जोड़ !
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ? अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़ !
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती , प्रेम और करुणा पे चढ़ के साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी ! महाशून्य के साथ सगाई तेरी रची गयी !
Sunday, August 1, 2010
Saturday, July 31, 2010
Thursday, July 29, 2010
Sunday, July 25, 2010
Friday, July 23, 2010
Wednesday, July 21, 2010
Monday, July 19, 2010
Sunday, July 18, 2010
Saturday, July 17, 2010
Friday, July 16, 2010
Thursday, July 15, 2010
Friday, July 9, 2010
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं यह खुमारी क्या करें,
मेरे वजूद में घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तनहाइयों में, तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से फर्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनूं में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है !
Thursday, July 8, 2010
Tuesday, July 6, 2010
Friday, July 2, 2010
Wednesday, June 30, 2010
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं ना विद्यते ॥
जो मुष्य आत्मा में रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा संतुष्ट हो , उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाक्रितेनेंह कशचानाह ।
ना चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदार्थ्व्यपाश्राया ॥
उस महापुरुष को ना तो कर्म से कोई प्रयोजन रहता है, और ना कर्मों के ना करने से,तथा संपूर्ण प्राणियों में भी, इसका किंचित मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
श्रीमद्भगवद्गीता , तृतीय अध्याय। श्लोक १७ व १८.
Tuesday, June 29, 2010
भ्रमति स्वान्त्वातैन न ममास्त्य सहिष्णुता ॥
मुझ अनंत महासागर में विश्व रुपी नौका , मन रुपी पवन के ज़ोर से इधर उधर डोलती है, परन्तु , इससे मुझको असहिष्णुता नहीं है। यूँ कहें दादा , प्रकृति के गुणों से संचालित यह संसार अपनी ही गति से इधर उधर डोलता है। मुझ चैतन्य के महासागर को उस से क्या लेना देना !
Monday, June 28, 2010
Sunday, June 27, 2010
Saturday, June 19, 2010
Wednesday, June 16, 2010
Sunday, May 30, 2010
Saturday, May 29, 2010
विछोह के भय में भावों का अतिरेक , धूप छाया का ये निर्मम खेल देख , ठिठक गया ।
घोर पीड़ा में भी आयोजन यूँ साहस का, चैतन्य के अनुपम स्वरों को सुन , ठिठक गया।
मृत्यु के सामीप्य में कुछ घट गया, शाश्वत जीवन की झलक पा, अहो ! मैं निखर गया !
Tuesday, May 25, 2010
जिन कन्धों पे चढ़ के जीवन देखा था, उन कन्धों को ढीलकते देख सिहर गया !
उर विशाल , धीर चित्त, निश्चल ह्रदय, धोंकनी सा सीना चलता देख सिहर गया !
नयन जो सतत ढाढस मुस्कुराताथे, वे चक्षु धीमे पड़ते देख सिहर गया !
फिर मिली जब आँख, पुनः सम्बन्ध जुड़ा,
Monday, May 24, 2010
Friday, May 21, 2010
छान्दोग्योपनिषद में एक सत्यकाम नाम के बालक की कथा का उल्लेख मिलता है।
नन्हे सत्यकाम को संन्यास की तीव्र इच्छा हुई। जब वह बालक अपने आचार्य के पास ब्रहचर्य की शिक्षा लेने गया तो आचार्य ने उस से उसका गोत्र पुछा । नन्हे बालक ने आ कर अपनी माँ से पूछा -"अम्बा, किम गोत्रोहम अस्मि ? ब्रह्मचर्यं भवतु विविद्याम। " अर्थात, माँ, मेरा गोत्र क्या है ? उसकी माँ एक दासी थी । उसने उत्तर दिया , मैं नहीं जानती पुत्र तेरा गोत्र क्या है? अपने आचार्य से कहना, तेरा नाम सत्यकाम है और तेरी माँ का नाम जाबाला है। बालक आचार्य के पास यही उत्तर ले केर गया। उसकी सत्यनिष्ठा तथा सरलता से प्रभावित हो आचार्य ने उसे शिष्य स्वीकार किया।
५००० साल पहले की भारतीय संस्कृति ने सामाजिक सहजता के वोह शिखर छुए थे, जिनसे ki
Thursday, May 20, 2010
Tuesday, May 18, 2010
Monday, May 17, 2010
Sunday, May 16, 2010
Saturday, May 15, 2010
Friday, May 14, 2010
Sunday, May 9, 2010
Saturday, May 8, 2010
पी ले जी भर के नूर छलकती आंख का भी , के यौवन की मधुशाला फिर ना जगेगी,
तू दुनिया के नगमों को सुन कान रख के, फिर सुनना भी चाहे ये कुछ ना कहेगी,
है वो खुश नसीब आँख उठी जिसकी ऊपर, ये चांदी की खन खन तो यूँ ही बजेगी,
वक़्त है जोड़ ले आलम -ए-रंग से हस्ती, ये दुनिया तो गाफिल थी गाफिल रहेगी।
Sunday, May 2, 2010
Thursday, April 29, 2010
तेरे खराम में हैं ज़लज़लों का राज़ निहां, हरेक गाम पे इक इंक़लाब पैदा कर।
बोहोत लतीफ़ हैं ऐ दोस्त तेक का बोसा,यही है जानेजां इसमें आब पैदा कर।
तेरा शबाब अमानत है सारी दुनिया की, तू खार जारे जहां में गुलाब पैदा कर।
तू इंक़लाब की आमत है इंतज़ार ना कर, जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर।
क्रान्ति आती नहीं , क्रांति में जाना पड़ता है .....
Monday, April 26, 2010
तड़पना है ना जलना है ना जल कर ख़ाक होना है, ये क्यूँ सोई हुई है फितरत-ए-परवाना बरसों से । कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे,नहीं मालूम क्यूँ खामोश है दीवाना बरसों से।
कोई सोजे तजल्ली से उसे निस्बत ना थी गोया,पड़ी है इस तरह ख़ाक इस तरह परवाना बरसों से। हसीनों पे ना रंग आया ना फूलों पर बहार आई,नहीं आया जो लब पे नगमा-ए-मस्ताना बरसों से।
जिसे लेना हो आ कर अब वो दरस-ए-जूनून ले ले, सुना है होश में है असगर -ए-दीवाना बरसों से।
Sunday, April 25, 2010
Wednesday, April 21, 2010
Monday, April 19, 2010
Sunday, April 18, 2010
ज़िन्दगी खुद एक इबादत है अगर होश रहे।
मंदिर और मस्जिद में सर पटकने वालों, कभी सोचा है ? अगर होश से जियो तो सारा जीवन ही एक प्रार्थना है।
सारा खेल होश का है। मरते समय जो पीड़ा होती है मरने की नहीं होती बल्कि बेहोशी में व्यर्थ गंवाए जीवन की होती है। और होश की यात्रा अभी और इसी समय से शुरू की जा सकती है ....................असुप्ताः मुनिः ।
Saturday, April 17, 2010
Thursday, April 15, 2010
Wednesday, April 14, 2010
Tuesday, April 13, 2010
Monday, April 5, 2010
तुलसी अपनी पत्नी को अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी मायके गयी। तुलसी उनके बिना ना रह पाए। पीछे पीछे पोहोंच गए। परन्तु वे इतने कामांध थे कि रास्ते में पड़ने वाली हर बाधा को उन्होंने बिना सोचे समझे पार कर लिया। उफनती हुई यानुमा नदी को उन्होंने एक सड़ी लाश पे बैठ के पार किया। ससुराल का द्वार बंद पा कर वो पिछले दरवाज़े से घुसे। छत्त पर चढ़ने के लिए सीढ़ी ना पा केर एक सांप के सहारे वो अपनी पत्नी के कक्ष तक जा पोहोंचे। उनकी यह हालत देख कर पत्नी ने एक ताना कसा।
मरण धर्मा देह से देखी ना ऐसी प्रीत, होती जो श्री राम में होती ना तो भवभीत।
अर्थात, हड्डी मांस के इस शरीर से ऐसी ममता मैंने कभी नहीं सुनी, इतनी प्रीती अगर आपको श्रीराम से होती तो दुनिया का भय आपके ह्रदय से समाप्त हो जाता। उस दिन तुलसी ने संसार छोड़ दिया।
प्यारे मित्रों, श्री सचिन तेंदुलकर पर इतने passionate discussion में आप लोगों ने जितनी ऊर्जा लगायी है, उसका १० प्रतिशत भी आज के युवा देश की समस्याओं के लिए लगा लें तो हमारी हर समस्या सुलझ सकती है।
परमात्मा हमारे जीवन को बोधगम्य बनाये....
शिवमस्तु !
Thursday, April 1, 2010
Wednesday, March 31, 2010
Monday, March 29, 2010
Saturday, March 20, 2010
ये है मैकदा, यहाँ रिंद हैं , यहाँ सब का साकी इमाम है,
ये हरम नहीं अरे शेख जी,यहाँ पारसाई (restraint) हराम है ,
जो ज़रा सी पी के बहक गया, उसे मैकदे से निकाल दो,
यहाँ कमनज़र का गुज़र नहीं, यहाँ अहले ज़र्फ़ का काम है,
ये जनाब-ए-शेख का फलसफा भी अजब है सारे जहां में,
जो यहाँ पिए तो हराम है, जो वहाँ पिए तो हलाल है,
इसी कायनात से ए जिगर, कोई इंक़लाब उठेगा फिर,
के बुलंद हो के भी आदमी, यहाँ ख्वाहिशों का गुलाम है।
Monday, March 15, 2010
Sunday, March 14, 2010
नफरत में जीना आसां है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्जी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पोहोंचे !
Saturday, March 13, 2010
Thursday, March 11, 2010
जैसे हम हैं वहाँ से तो ये संभव नहीं दीखता। पंडों, राजनीतिज्ञों, ओर लाला ने हमें कीडे मकोडे होने का ठीक ठीक एहसास करा दिया है। हम अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ही चुके हैं। अभी इन चालबाजियों के चलते, हम सर के बल खड़े हैं। जब हमें कबीर समझ में आने लगें, तो सीधे होने कि यात्रा शुरू हो गयी। जिस दिन हम अपने पैरों पे खड़े हुए, हम ब्रह्म से एकरूप हो जायेंगे।
Sunday, March 7, 2010
कबीरा खड़ा बज़ार में, लिए लकुटिया हाथ, जो घर बारे आपना , चले हमारे साथ।
कबीर के रूप में भारतवर्ष में एक महान प्रतिभा ने जन्म लिया था। कई बातें कबीर को भक्ति आन्दोलन में बोहोत अनूठा व अद्वितीय स्थान देती हैं। अधिकतर अवतार , या भारतीय धर्माकाश के सबसे प्रज्ज्वलित सितारे राजपुरुष थे, राजघरानों से सम्बंधित थे, या समकालीन समाज के उच्च वर्गों से आते थे।। राम, कृष्ण, बुद्ध महावीर, नागार्जुन, शंकर, मीरा , तुलसी, रामानुज, वल्लभ, आदि सभी आभिजात्य वर्ग से आते थे।
भोग विलास की प्रचुरता में यदि जीवन से ऊब ओर बिरक्ति ना हो तो वह व्यक्ति तो कोई मूढ़ ही हो सकता है, इसलिए कृष्ण ओर बुद्ध सरीखे व्यक्तियों की आध्यात्मिक खोज मूल्यवान होकर भी क्रांतिकारी नहीं है। पर दरिद्रता में भी जिसके भीतर का कमल खिला हो तो यह घटना आमूल क्रांति की हो जाती है।
कबीर के माध्यम से ही इस संभावना के द्वार खुलते हैं, कि इहलोक में धन कि प्रचुरता या सत्ता के मद से गुज़रे बिना भी जीवन की उच्चतर संभावनाओं की ओर आँख उठ सकती है। यह एक बात कबीर के असाधारण प्रतिभा व प्रज्ञा का प्रमाण देने हेतु पर्याप्त है।
दूसरी बात जो कबीर को मूल्यवान बनाती है, वो है, निर्गुण की उपासना का समाज में व्यापक प्रसार ! मीरा , सूरदास, तुलसी इत्यादि द्वारा परमात्मा के साकार रूप की उपासना के दौर में कबीर ने परम के निर्गुण रूप का सरल भाषा में प्रतिपादन किया तथा उसको अपनी वाणियों द्वारा घर घर में गूंजा दिया। मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे, में तो तेरे पास में, ऐसी सीधी चोट कबीर के ही सामर्थ्य से उपजती है ।
स्थूल रूप में परमात्मा की धारणा सरल है। केवल उपनिषदों के ऋषियों ने ही अहम् ब्रह्मास्मि का अमर उद्घोष कर निर्गुण ब्रह्म को स्थापित किया था, पर वह चैतन्य का शिखर केवल गिने चुने ब्राह्मणवादी विचारधाराओं कि गिरफ्त में ही रहा। कबीर ने न सिर्फ उस ऊंचाई को छुआ जहां सूक्ष्म निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ, बल्कि, उस निराकार परमेश्वर को लोकवाणी में बाँध कर सर्वजन के लिए उपलब्ध करा दिया। यह कोई छोटी मोती घटना नहीं थी, एक क्रांति का सूत्रपात थी। कबीर के इस साहस के चलते ही भारतवर्ष में निर्गुण संतों कि एक लम्बी श्रंखला का निर्माण हुआ, जिस में दादू, रज्जब, धर्मी दास, सहजो बाई, नानक ,पल्टू ,चरण दास, दरिया, फरीद जैसे अनेकानेक नाम आते हैं।
कबीर की तीसरी ओर सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है आध्यात्म का गृहस्थ जीवन में सहज मिश्रण ! सदियों से धर्म के अन्वेषकों के लिए संसार को छोड़ कर हिमालय की ओर प्रस्थान करना अनिवार्य माना जाता रहा है। कबीर ने प्रामाणिक रूप से ये स्थापित किया कि आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए संसार को पीठ दिखाना आवश्यक नहीं। इस संसार में रहते हुए भी जीवन के शिखर को छुआ जा सकता है। कबीर ने स्वयं विवाह किया, तथा गृहस्थ जीवन के दायित्वों को निभाते हुए आध्यात्मिक जीवन के गूढ़ रहस्यों को भी जिया। जिस तरह से रूढ़िवादी ताक़तों ने गृहस्थ जीवन को निन्दित किया था, साधारण मुनष्य के लिए परम के द्वार सर्वथा बंद कर दिए गए थे। कंचन ओर कामिनी को नरक का द्वार बता कर दकियानूसी पंडों ने धर्म के प्रगटीकरण की सब संभावनाएं ही समाप्त कर दी थी। कबीर ने अपने जीवन से ही क्रांति का आरम्भ किया। स्वयं किसी पर बोझ न रहते हुए, वे साक्षी भाव को उपलब्ध हुए। उनके आस पास रहने वालों के लिए , यह चमत्कार से कम नहीं था। इसीलिए बे पढ़े लिखे साधारण से जुलाहे का भी हज़ारों कि संख्या में शिष्यों ने अनुकरण किया। आजीविका कमाते हुए ही ,व्यक्ति ध्यान में भी जा(work meditation ) सकता है, इस युग प्रवर्तनकारी घटना के प्रणेता कबीर ही थे।
कबीर का एक ओर योगदान जो समकालीन समाज में काम में लिया जा सकता है, वह है, रूढ़ियों पर चोट, तथा सर्वथा सम्यक धर्म निरपेक्षता। सत्य का साक्षात्कार रूढ़ियों के सर्वथा विपरीत है, यह कबीर के जीवन से ही समझ में आता है। किसी कर्मकांड कि परवाह न करके, एक साधारण से जुलाहे को चादर बुनते बुनते यदि आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, तो यह बात मूल्यवान है ।
सनातन धर्म एवं इस्लाम , दोनों धर्मों की रुढियों पर कबीर ने बेहिचक चोट की है। कबीर के जीवन कि सबसे बगावती घटना उनके देह त्याग से सम्बंधित है , जिसे यहाँ उधृत करना उचित होगा। उस समय यह प्रचलित था कि काशी में मृत्यु का अर्थ सीधा वैकुण्ठ वास होगा, और एक गाँव मगहर में मरने वाला व्यक्ति निश्चित ही नरक को प्राप्त होगा। अपने अंत समय में कबीर आग्रह पूर्वक मगहर चले गए और वहीं अपनी इहलीला समाप्त की। अपने शिष्यों और प्रेमियों द्वारा विरोध पर उन्होंने एक अत्यन्य प्यारे तर्क का प्रयोग किया " काशी में मर के यदि मुक्त हुआ तो क्या मुक्त हुआ, परमात्मा कि करुणा तो तभी मानी जायेगी जब मगहर में मरूं और मुक्त हो जाऊं।" परमात्मा पर इतनी अगाध श्रद्धा और इतने प्रेम से उसे चुनौती देना, कबीर के सामर्थ्य का एक अनुपम उदाहरण है।
जैसा कि समकालीन भारतीय समाज में प्रचलित हो गया है, हम अपनी विरासत को विस्मृत करते जा रहे हैं, और इसके दुष्परिणाम हमारे सामने आने भी लगे हैं। प्रचंड भोगवाद कि संस्कृति मनुष्यता को दुःख और नफरत कि भयंकर आग में जला रही है। अपने प्रज्ञा पुरुषों को भुला कर हम अपने ही हाथों अपनी हत्या कि तय्यारी कर रहे हैं। जीवन के जिन अद्भुत रहस्यों पर से कबीर ने पर्दा उठाया है, अस्तित्व की जिन ऊंचाइयों को कबीर की प्रतिभा हमारे लिए उघाडती है, वे हमें भारतवर्ष में जन्म लेने से अनायास ही मिल गए हैं। आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम उन्हें हमारे संतों के जीवन से अवगत कराएं। कबीर जैसे महापुरुषों कि आधारशिला पर नई नस्ल उत्तुंग शिखरों का निर्माण करें ,तभी सम्यक मानवता का विकास संभव होगा।
Thursday, March 4, 2010
जिस दिन ध्यान सधा , उस दिन दिख गया कि जो कुछ भी अर्थपूर्ण है, वो मेरे प्रयास से नहीं, अस्तित्व कि करुणा ओर अनुकम्पा से मिला है। कहाँ सुनन कि है नहीं देखा देखी बात ! न संतोष, न असंतोष, अब केवल विराट के समक्ष समर्पण ! सघन आनंद !
Friday, February 19, 2010
बाप बोहोत सी बातें नहीं भी जानता है, जो बेटा जान सकता है। रोज़ ज्ञान विकसित हो रहा है ,इसलिए बाप का ज्ञान तो पिछड़ता जाता है, out of date होता जाता है। तो बेटे के मन में स्वाभाविक हो सकता है कि बाप कुछ भी नहीं जानता । श्रद्धा कैसे पैदा हो?श्रद्धा किन्हीं तथ्यों पे आधारित नहीं हो सकती, श्रद्धा तो केवल इस बात पे आधारित हो सकती है कि पिता उद्गम है ,स्रोत है,जहां से में आया हूँ उस से पार जाने का कोई उपाय नहीं ! मैं कितना ही जान लूँ, मैं कितना ही बड़ा हो जाऊं , मेरा अहंकार कितना ही प्रतिष्ठित हो जाए, लेकिन फिर भी मूल ओर उद्गम के सामने मुझे नत होना ही है, क्यूंकि कोई भी अपने उद्गम से ऊपर नहीं जा सकता । कोई वृक्ष बीज से बड़ा नहीं होता, हो भी नहीं सकता। बीज में पूरा वृक्ष छुपा है। कितना ही विराट वृक्ष हो जाये, वो छोटे से बीज में छिपा है। उस से अन्यथा होने कि कोई नियति नहीं है। ओर अंतिम परिणाम जो वृक्ष का होगा वो यह कि वो उन्ही बीजों को पुनः पैदा कर जाएगा।
उद्गम से आप कभी बड़े नहीं हो सकते। मूल से विकास कभी बड़ा नहीं हो सकता। वृक्ष से बीज बड़ा नहीं, चाहे कितना ही बड़ा दिखाई पड़े। इस अस्तित्वगत घटना कि गहरी प्रतीति,माता पिता के प्रति गहरे आदर से भर सकती है, लेकिन आप इसे माता पिता कि तरह नहीं सुनना , बेटे व बेटियों कि तरह इसे सुनना। यह सुनकर माता पिता के प्रति आपके ह्रदय में श्रद्धा उठे ,इसलिए कह रहा हूँ । अपने घर मैं अपने बच्चों से श्रधा मत मांगने लग जाना, क्यूंकि तब आप बात चूक ही गए।
जिस समाज मैं भी, माता पिता के प्रति आदर कम हो जाएगा, उस समाज में इश्वर भाव खो जाता है, क्यूंकि इश्वर आदि उद्गम है। वो परम स्रोत है। अगर आप अपने बाप से आगे चले गए हैं, तीस साल में , अगर आप ओर आपके बाप के बीच तीस साल का फासला है तो, परम पिता परमेश्वर से तो आप बोहोत आगे चले गए होंगे। अरबों खरबों वर्षों का फासला हो गया है। अगर परमात्मा मिल जाये तो महा जड़ ,महा मूढ़ मालूम पड़ेगा , जब पिता ही मूढ़ मालूम पड़ता है। अगर परमात्मा से आपका मिलन हो तो वोह तो आपको मनुष्य भी मालूम नहीं पड़ेगा। पीछे की ओर, मूलकी ओर, उद्गम कि ओर, सम्मान का बोध अत्यंत विचार ओर विवेक कि निष्पत्ति है , वो प्रकृति से नहीं मिलती, विमर्श,चिंतन व ध्यान से उपलब्ध होती है। पर ध्यान रहे जो भी कहा जा रहा है, वोह आपसे बेटे -बेटियों की तरह कहा जा रहा है, माता ओर पिता कि तरह नहीं।
Wednesday, February 17, 2010
हर आन हंसी हर आन ख़ुशी हर आन अमीरी है बाबा , जब आशिक मस्त फकीर हुए तब क्या दिलगीरी है बाबा ,
हम चाकर जिसके हुस्न के हैं, वो दिलबर सबसे आला है, उसने ही हमको जी बक्शा उसने ही हमको पाला है।
क्या कहिये ओर नजीब आगे, अब कौन समझे वाला है, हर आन हंसी........
कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ जोर नहीं, कुछ दाद नहीं फ़रियाद नहीं, कुछ क़ैद नहीं कुछ बंद नहीं ,कुछ फ़िक्र नहीं, आज़ाद नहीं।
शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं, हैं जितनी बातें दुनिया की , सब भूल गए, कुछ याद नहीं।
हर आन हंसी......
है आशिक ओर माशूक जहां वहाँ शाह-ए-वजीरी है बाबा, न रोना है न धोना है, न दर्द असीरी है बाबा,
दिन रात बहारें चौलें हैं ओर ऐश-ए-सफीरी है बाबा, जो आशिक हुए सो जाने हैं ये भेद फकीरी है बाबा ।
Sunday, February 14, 2010
Friday, February 12, 2010
बंधा हूँ स्वप्न में लघु वृत्त में हूँ मैं, यूँ तो व्योम का विस्तार हूँ मैं,
समाना चाहती जो बीन उर में , विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं,
भटकता खोजता हूँ ज्योति तम में, सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं ।
अहम् ब्रह्मास्मि ।
I am the eternal Brahm.
Thursday, February 11, 2010
कष्ट जीवन का तथ्य (fact) है, दुःख हमारी व्याख्या है । बचकानी बुद्धि के कारण ही हम जीवन के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर सुख ओर दुःख बना लेते हैं। वयस्क बुद्धि जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है। बचकानी बुद्धि के कारण ही हम अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं ( blame game) , और अपने सुखों के लिए खुद की पीठ ठोकते हैं । हम ये भूल बैठे हैं कि सुख और दुःख हमारे मन के प्रक्षेपण (projections) हैं। जो आज सुख है वोह कल दुःख हो जायेगा , जो कल दुःख था वोह आज सुख है। तात्विक दृष्टि से तो सुख और दुःख केवल त्रिगुणों का बरतना है ,चेतना को तो यह गुण छूते भी नहीं हैं, परन्तु सांसारिक दृष्टि से भी यदि हम जीवन के सत्य को पहचान लें तो हमारा बोहोत सा कष्ट कम हो सकता है।
जीवन की प्रत्येक सफलता -असफलता , सम्बन्ध, प्रेम, पीड़ा , आशा और निराशा , मैत्री और शत्रुता , जैसे प्रत्येक अनुभव का प्रयोग यदि हम केवल अपने जीवन को निखारने के लिए करें तभी नए मनुष्य का विकास संभव है। लेकिन बचकानी बुद्धि से यह नहीं हो सकता , इसके लिए एक सम्यक रूप से विकसित वयस्क बुद्धि चाहिए। सतत अन्तरावलोकन (introspection) ! मैं सुख और दुःख का निर्माण कर रहा हूँ या अपनी आत्मा का विकास ! इतनी जागरूकता तो चाहिए ही ।
ठोकरें खा कर भी न सम्हले ये मुसाफिर का नसीब,
राह के पत्थर ने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया ।
Sunday, February 7, 2010
यदि इस गीत के मर्म की हल्की सी झलक भी तुम्हें मिली है , तो तुम भाग्यशाली हो। याद है ना , परमात्मा सृजन में बसता है । अपने आसपास बिखरे हुए परम का आनंद लो। एक ही बात स्मरण रहे, अहंकार की यात्रा पे मत निकल जाना। तुम्हें परम का स्वाद मिल रहा है, इसका मतलब यह नहीं की किसी ओर को नहीं मिल रहा है। सब की अपनी अपनी यात्रा है। सबकी ओर समझ ओर करुणा से देखना। अन्यथा परम का यह खुला दरवाजा भी तुम्हारे लिए बंद न हो जाए ! ................आनंद !
प्रेम,
Friday, February 5, 2010
फूलों पर मोती बिखरे थे , ज़र्रों की किस्मत चमकी थी,
खुशबू के खजाने लुटते थे, और दुनिया बहकी बहकी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं अब याद नहीं,
सूरज की नर्म शिराओं पर ,कलियों के रूप निखारते हों ,
सरसों के नाज़ुक शाखों पर, सोने के फूल चमकते हों,
ऐ दोस्त तुझे................
फूलों के सागर अपने थे, शबनम की सहबा अपनी थी,
ज़र्रों के हीरे अपने थे, तारों की माला अपनी थी,
दरिया की लहरें अपनी थी, लहरों का तरन्नुम अपना था,
ज़र्रों से ले केर तारों तक यह सारी दुनिया अपनी थी,
ऐ दोस्त तुझे शायद वो दिन, अब याद नहीं, अब याद नहीं।
Tuesday, January 12, 2010
Prarthna
प्रथम- जब भी हम परम से कोई मांग करते हैं , तो हम दरअसल क्या कह रहे हैं? कि हम परमात्मा से ज्यादा समझदार हैं ! उसे हमारी सलाह देते हैं , की चूंकि तू नहीं जानता हमारे लिए क्या हितकर है, इसलिए हम ही तुझे बता देते हैं । यह हद दर्जे की कृतघ्नता है ।
द्वितीय - क्या हम परमात्मा की चापलूसी कर रहे हैं? उसका गुणगान सुन कर वह प्रसन्न हो कर हमारी वासनाओं की पूर्ती कर देगा ? मानो परमात्मा न हुआ , कोई मिनिस्टर हो गया ! हम तो परम के स्तर तक न उठ पाए, वरन परम को ही हमने अपने स्तर तक गिरा दिया !
तृतीय - प्रार्थना एक तरह के hypnosis का भी काम करती है । चैतन्य को उर्ध्वगामी बनाना बोहोत श्रम मांगता है , तो हम एक सुगम मार्ग बना लिए हैं। आत्मानुसंधान की झंझट कौन मोल ले ! सीधे सादे शब्द दोहराए चले जाओ, काम हो गया !
ऐसी लालची , बचकानी व नपुंसक खोज से परम चैतन्य कभी नहीं मिलने वाला ! आस्तिकों की यह दुनिया इतने भयंकर कष्ट में क्यूँ पडी है? क्यूंकि हमारी मौलिक दृष्टि भ्रांत है । प्रार्थना हमारी जागतिक इच्छाओं की पूर्ती की application नहीं हो सकती। प्रार्थना तो सिर्फ एक धन्यवाद हो सकती है , उस परम के प्रति , जिसने हमारी पात्रता न होने के उपरान्त भी हमें जीवन दिया।
नयी मनुष्यता का जन्म तभी संभव है जब हम प्रार्थना को परम से भीख मांगने का उपक्रम न मान कर, केवल अनुग्रह से भर जाएँ। जितना गहरा धन्यवाद का भाव हमारे अन्दर होगा उतना ही चैतन्य हम पर बरसेगा और हमारे व्यक्तित्व का अनुपम निखार सहजता से हो जायेगा।
इसी रफ़्तार-ए-आवारा से भटकेगा यहाँ कब तक, अमीर -ए-कारवां बन जा गुबार-ए-कारवां कब तक !
Saturday, January 2, 2010
यह मनुष्य जीवन के सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जिस जीवन को प्रति क्षण नई सृजनात्मकता में बिताया जा सकता था, वो जीवन मात्र मृत्यु कि एक उबाऊ प्रतीक्षा बन के रह जाता है।
तो अब की बार जब मन हमें रोके तो रुकें नहीं। अज्ञात की और छलांग लें ! अस्तित्व पे भरोसा रखें ! जिसने जीवन दिया है वही सम्हालेगा भी।
